समझना है अगर मुझ को तो बस इतना समझना ग़मों के दौर में भी तुम मुझे अपना समझना
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उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़ियादा उसे रुलाती थी
Ali Zaryoun
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तुम्हें हम भी सताने पर उतर आएँ तो क्या होगा तुम्हारा दिल दुखाने पर उतर आएँ तो क्या होगा हमें बदनाम करते फिर रहे हो अपनी महफ़िल में अगर हम सच बताने पर उतर आएँ तो क्या होगा
Santosh S Singh
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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कोई शहर था जिस की एक गली मेरी हर आहट पहचानती थी मेरे नाम का इक दरवाज़ा था इक खिड़की मुझ को जानती थी
Ali Zaryoun
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हज़ार इश्क़ करो लेकिन इतना ध्यान रहे कि तुम को पहली मोहब्बत की बद-दुआ न लगे
Abbas Tabish
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ये दुनिया इस लिए ही मुझ को पागल कह रही है मेरी कश्ती जो तूफ़ाँ के मुक़ाबिल बह रही है
Avtar Singh Jasser
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ज़रा नज़दीक आ कर सुन मेरी इक बात ऐ उर्दू मेरी तहरीर बिन तेरे मुक़म्मल हो नहीं सकती
Avtar Singh Jasser
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तुझ से दूर हुआ तो ये मालूम हुआ ख़ुद से कितना दूर निकल आया था मैं
Avtar Singh Jasser
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शहर के रस्ते लगे जब सख़्त अपने पाँव को हम दिवाने लौट आए फिर से अपने गाँव को माँ के आँचल का सुकूँ भी याद आया तब हमें याद जब हम ने किया पीपल की ठंडी छाँव को
Avtar Singh Jasser
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कहाँ तक साथ दोगी तुम हमारा सनम जावेदाँ है ये ग़म हमारा
Avtar Singh Jasser
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