सूरज से जंग जीतने निकले थे बेवक़ूफ़ सारे सिपाही मोम के थे घुल के आ गए
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सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
Allama Iqbal
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उसे समझने का कोई तो रास्ता निकले मैं चाहता भी यही था वो बे-वफ़ा निकले
Waseem Barelvi
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तुम्हें पता है मिरे हाथ की लकीरों में तुम्हारे नाम के सारे हुरूफ़ बनते हैं
Fareeha Naqvi
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तुम सोच रहे हो बस, बादल की उड़ानों तक मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक
Aalok Shrivastav
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ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई माँगे जो हो परदेस में वो किस सेे रज़ाई माँगे
Rahat Indori
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वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया
Rahat Indori
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मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का
Rahat Indori
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अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते
Rahat Indori
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ऐ वतन इक रोज़ तेरी ख़ाक में खो जाएँगे सो जाएँगे मर के भी रिश्ता नहीं छूटेगा हिंदुस्तान से ईमान से
Rahat Indori
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गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा
Rahat Indori
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