तजरबा जितना बढ़ने लगता है आईना शक्लें पढ़ने लगता है
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घर में घुसता हूँ तो लगता है कि रेगिस्तान है मेरे इक कमरे में सारे शहर भर की गर्द है
nakul kumar
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तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है तेरे आगे चाँद पुराना लगता है
Kaif Bhopali
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अब तो लगता है कि आ जाएगी बारी मेरी किस ने दे दी तेरी आँखों को सुपारी मेरी
Abrar Kashif
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किसी गली में किराए पे घर लिया उस ने फिर उस गली में घरों के किराए बढ़ने लगे
Umair Najmi
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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है
Qaisar-ul-Jafri
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काग़ज़ की नाव बनाते थे और उस पर भी इतराते थे अब तो छुट्टी भर है बस तब दीवाली यार मनाते थे
Shobhit Dixit
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तेरी ही यादों में पाकीज़ा होना पड़ता है उस के ख़ातिर भी इन आँखों को रोना पड़ता है तुम को तो बस मेरे ख़्वाबों में आना होता है ये सोचो मुझ को तो रातों में सोना पड़ता है
Shobhit Dixit
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हँसकर के कितना रोते हैं लड़के भी लड़के होते हैं
Shobhit Dixit
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पापा का वो हल्का वाला कुर्ता पहना कंधे पे कुछ भारी भारी सा लगता है
Shobhit Dixit
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अब तो मेरे सारे सावन बीत गए बिन मौसम अब बादल बरसे उस सेे क्या
Shobhit Dixit
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