काग़ज़ की नाव बनाते थे और उस पर भी इतराते थे अब तो छुट्टी भर है बस तब दीवाली यार मनाते थे
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जो न खेली होली 'अमृत' के साथ में हाथों में दीवाली तक गुलाल रहेगा
Amritanshu Sharma
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अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए
Munawwar Rana
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तेरे एहसास को ख़ुशबू बनाते जो बस चलता तुझे उर्दू बनाते यक़ीनन इस से तो बेहतर ही होती वो इक दुनिया जो मैं और तू बनाते
Saurabh Sharma 'sadaf'
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साहिल पे क़ैद लाखों सफ़ीनों के वास्ते मेरी शिकस्ता नाव है तूफ़ाँ लिए हुए
Salik Lakhnavi
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मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं
Unknown
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जिन हाथों से हो कश्मीर बनाते तुम काश उसी से हर तक़दीर बनाते तुम
Shobhit Dixit
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साँप को अपना बनाया जा रहा है आस्तीनों में बसाया जा रहा है
Shobhit Dixit
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तेरी ही यादों में पाकीज़ा होना पड़ता है उस के ख़ातिर भी इन आँखों को रोना पड़ता है तुम को तो बस मेरे ख़्वाबों में आना होता है ये सोचो मुझ को तो रातों में सोना पड़ता है
Shobhit Dixit
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पापा का वो हल्का वाला कुर्ता पहना कंधे पे कुछ भारी भारी सा लगता है
Shobhit Dixit
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अब तो मेरे सारे सावन बीत गए बिन मौसम अब बादल बरसे उस सेे क्या
Shobhit Dixit
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