अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए
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हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
Allama Iqbal
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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं
Rahat Indori
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
Bashir Badr
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मैं चाहता था मुझ सेे बिछड़ कर वो ख़ुश रहे लेकिन वो ख़ुश हुआ तो बड़ा दुख हुआ मुझे
Umair Najmi
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तुम उन के वा'दे का ज़िक्र उन से क्यूँँ करो 'ग़ालिब' ये क्या कि तुम कहो और वो कहें कि याद नहीं
Mirza Ghalib
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न जाने कैसी महक आ रही है बस्ती से वही जो दूध उबलने के बा'द आती है
Munawwar Rana
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सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की मैं मिट्टी गूँधता था अब डबलरोटी बनाता हूँ
Munawwar Rana
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अब आप की मर्ज़ी है सँभालें न सँभालें ख़ुश्बू की तरह आप के रूमाल में हम हैं
Munawwar Rana
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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
Munawwar Rana
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उस की तरफ़ से फूल भी आएँगे एक रोज़ पत्थर उठा के चूम ले इस को पहल समझ
Munawwar Rana
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