तू कहता छोड़ कर आता तिरी जानिब तिरा साया ही काफ़ी था सफ़र ख़ातिर
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो
Rahat Indori
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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बात ही कब किसी की मानी है अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी ये कलाई ये जिस्म और ये कमर तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी
Jaun Elia
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ये बहस छोड़ कि कितनी हसीन है दुनिया तू ये बता कि तेरा दिल कहीं लगा कि नहीं
Vijay Sharma
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कुछ ऐसा सितम वक़्त ने मुझ पे जो किया है चाहा जिसे भी वो ही गया हाथ छुड़ा के
Manish Yadav
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तुम्हें वा'दा निभाना था अजल तक साथ जाना था किनारे आज बैठे हैं हमें तो डूब जाना था तुम्हें समझाऊॅं कितना मैं कहा कुछ भी न माना था ये तुम ने क्यूँ बचाया है उसे मुझ को डुबाना था
Manish Yadav
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रक्खे थे हिफाज़त से जो ख़त मैं ने वो सब आज वापस मैं यहाँ आया हूँ दरिया में बहा के
Manish Yadav
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तुम जिस्मों का प्यार समझ बैठे हम को तो रूहों तक जाना था
Manish Yadav
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नफ़रती ये लोग देखो हाथ अपने मल रहे हैं इश्क़ की ये राह कब से ये दिवाने चल रहे हैं तय हुआ था बस्तियाँ ये होंगी रौशन रौशनी से पर चराग़ों की जगह अब आशियाने जल रहे हैं
Manish Yadav
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