तुम्हारे ग़म को मगर ओढ़े रक्खा तीनों दिन मैं चाहता तो मना सकता था तेरे बिन ईद
Related Sher
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
401 likes
ज़रा ठहरो कि शब फीकी बहुत है तुम्हें घर जाने की जल्दी बहुत है ज़रा नज़दीक आ कर बैठ जाओ तुम्हारे शहर में सर्दी बहुत है
Zubair Ali Tabish
173 likes
आज का दिन भी ऐश से गुज़रा सर से पाँव तक बदन सलामत है
Jaun Elia
166 likes
तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
Tehzeeb Hafi
1279 likes
बिछड़ गए तो ये दिल उम्र भर लगेगा नहीं लगेगा लगने लगा है मगर लगेगा नहीं नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
Umair Najmi
1244 likes
More from Faiz Ahmad
उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे
Faiz Ahmad
1 likes
कोई कासिद नहीं है मेरे क़रीब तेरे ख़त मेरे तक नहीं आते
Faiz Ahmad
1 likes
तिरे जाने का मिरा गैज़ कम नहीं हो रहा कि गुनाह कर के भी कोई ग़म नहीं हो रहा
Faiz Ahmad
1 likes
रुख़-ए-निगाह-ए-आतिशा से कलाम कर के आ रहे हैं हम उन निगाहों को सर-ए-रह सलाम कर के आ रहे हैं
Faiz Ahmad
1 likes
जश्न-ए-मक़तल को मिरे शाम मनाते तो सही तुम चराग़ों को हवाओं में जलाते तो सही पा-ब-जौलाँ ही सही दौड़ के आता मैं तो अपने जानिब मुझे इक बार बुलाते तो सही
Faiz Ahmad
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Faiz Ahmad.
Similar Moods
More moods that pair well with Faiz Ahmad's sher.







