sherKuch Alfaaz

उस के पैग़ाम ने उम्मीद को भी तोड़ दिया उस का कहना है मुझे पाने की कोशिश न करे

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किसी के रंज से उस को निकाल कर पहले उसी के रंज में अब ख़ुद ही फस गया हूँ मैं बड़ा कमीन हूँ दलदल में पैर ख़ुद रख कर ये कह रहा हूँ कि धोखे से धस गया हूँ मैं

Faiz Ahmad

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जाने कब से बरस रहा हूँ मैं इक नज़र को तरस रहा हूँ मैं ज़िन्दगी सहरा हो गई है मिरी मौत को जो तरस रहा हूँ मैं

Faiz Ahmad

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मैं तिरी मोहब्बत की कभी भी बर्बादी नहीं करूँंँगा मर मिटूंँगा लेकिन और किसी से मैं शादी नहीं करूँंँगा

Faiz Ahmad

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दिल को ले कर सुब्ह से ये ही गुमान आ रहा है जब कोई ज़ख़्म नहीं क्यूँ ये निशान आ रहा है तुम पे रहमत भी अज़ीयत की तरह बरसेगी देखते जाओ कि अहमद रमाज़ान आ रहा है

Faiz Ahmad

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ये सच है उस सेे मिलने की तवक्को फिर नहीं करते मगर पहली मोहब्बत को भुलाया भी नहीं जाता

Faiz Ahmad

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