उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
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साल के तीन सौ पैंसठ दिन में एक भी रात नहीं है उस की वो मुझे छोड़ दे और ख़ुश भी रहे इतनी औक़ात नहीं है उस की
Muzdum Khan
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जाने क्या कुछ कर बैठा है बहुत दिनों से घर बैठा है वो मधुमास लिखे भी कैसे शाखों पर पतझर बैठा है
Vigyan Vrat
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मुझे आज़ाद कर दो एक दिन सब सच बता कर तुम्हारे और उस के दरमियाँ क्या चल रहा है
Tehzeeb Hafi
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ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैं ने बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला
Bashir Badr
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गुमान है या किसी विश्वास में है सभी अच्छे दिनों की आस में है ये कैसा जश्न है घर वापसी का अभी तो राम ही वनवास में है
Azhar Iqbal
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है हुसूल-ए-आरज़ू का राज़ तर्क-ए-आरज़ू मैं ने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे
Seemab Akbarabadi
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दिल की बिसात क्या थी निगाह-ए-जमाल में इक आईना था टूट गया देख-भाल में
Seemab Akbarabadi
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दुनिया है ख़्वाब हासिल-ए-दुनिया ख़याल है इंसान ख़्वाब देख रहा है ख़याल में
Seemab Akbarabadi
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माज़ी-ए-मरहूम की नाकामियों का ज़िक्र छोड़ ज़िन्दगी की फ़ुर्सत-ए-बाक़ी से कोई काम ले
Seemab Akbarabadi
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अब क्या बताऊँ मैं तिरे मिलने से क्या मिला इरफ़ान-ए-ग़म हुआ मुझे अपना पता मिला
Seemab Akbarabadi
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