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उम्र के हर दौर देखे हैं उन्होंने भी उन बुज़ुर्गों की दुआऍं देती बरकत हैं

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ज़िन्दगी को यूँँ फिर आज़माने के बा'द कुछ भी तो अब नहीं है ज़माने के बा'द कैसे ख़ुद को भी दे अब तसल्ली यहाँ पे कैसे ग़म में है वो गुनगुनाने के बा'द

Naviii dar b dar

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ज़मीं पे आसमाँ पिघला हुआ ही पाओगे समय यूँँ हाथों से निकला हुआ ही पाओगे किसी के वास्ते ख़ुद को सँवार कर देखो तुम अपने आप को बदला हुआ ही पाओगे

Naviii dar b dar

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थे यूँँ डूबे हुए इस इश्क़ में इक शख़्स की ख़ातिर जो मेरा हो नहीं सकता ये था मालूम तो मुझ को

Naviii dar b dar

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वो मेरा ही बना अपना भी जिस तरह यारों हवाओं को भी तो इस की ख़बर नहीं थी यूँँ

Naviii dar b dar

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वो अलग किरदार में दिखता है अब आदमी क्यूँ हार में दिखता है अब देख कर दुख होता है दिल को मेरे झूठ जब अख़बार में दिखता है अब

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