वो शाख़ों पे गुलाब इक और आया लो माह-ए-फ़रवरी का दौर आया
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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जहाँ पंखा चल रहा है वहीं रस्सी भी पड़ी है मुझे फिर ख़याल आया, अभी ज़िन्दगी पड़ी है
Zubair Ali Tabish
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इस दौर-ए-सियासत का इतना सा फ़साना है बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है
Unknown
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फोन भी आया तो शिकवे के लिए फूल भी भेजा तो मुरझाया हुआ रास्ते की मुश्किलें तो जान लूँ आता होगा उस का ठुकराया हुआ
Balmohan Pandey
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भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है
Ahmad Faraz
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तमाम उम्र हमें साथ साथ चलना है बस इतना कह के सफ़र कर लिया जुदा उस ने
Ajeetendra Aazi Tamaam
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तुम्हारे शहर में आ कर ठिकाना ढूँढ़ते हैं हम अपने शहर में होते तो घर गए होते
Ajeetendra Aazi Tamaam
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ये मासूम चेहरा ये क़ातिल निगाहें बहुत ख़ूब-सूरत हैं सारी अदाएँ
Ajeetendra Aazi Tamaam
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किसी को रौशनी देने की ख़ातिर चराग़ इक उम्र भर जलता रहा है
Ajeetendra Aazi Tamaam
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एहसास नहीं होता लुटने का सनम हम को जब आप की महफ़िल से हम लौट के आते हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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