यतीमों की तरह बस पाल रक्खा है इन्हें हम ने हमें जो दुख मिले हैं वो हमारे दुख नहीं लगते किसी की आँख में रह कर किसी के ख़्वाब देखे हैं हजारों कोशिशें की पर किनारे दुख नहीं लगते
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तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
Faiz Ahmad Faiz
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अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है
Qamar Moradabadi
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अपनी मुट्ठी में छुपा कर किसी जुगनू की तरह हम तेरे नाम को चुपके से पढ़ा करते हैं
Aleena Itrat
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अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में
Shoaib Bin Aziz
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तुम भी वैसे थे मगर तुम को ख़ुदा रहने दिया इस तरह तुम को ज़माने से जुदा रहने दिया
Khalil Ur Rehman Qamar
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इशारे में उस ने कहा मुस्कुरा कर इशारे से तुम को इशारा करेंगे
Rohit Gustakh
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महकते हैं अभी तक हाथ ख़ुशबू से कि गुल के गाल खींचे थे कभी हम ने
Rohit Gustakh
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जब उन को बाहें फैलाए देखा तो याद हमें आई सावन के झूलों की
Rohit Gustakh
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ज़माने में किसी से दिल लगाकर किसी का दिल दुखाया था किसी ने
Rohit Gustakh
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कहीं ये सब्र खा जाए न हम को किसी के दुख समेटे फिर रहे हैं
Rohit Gustakh
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