ye ek abr ka tukda kahan kahan barse tamam dasht hi pyasa dikhai deta hai
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मुझ को किस दश्त से लाई थी कहाँ छोड़ गई इन हवाओं से कोई पूछने वाला भी नहीं
Tehzeeb Hafi
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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अपने दिल में बसाओगे हम को और गले से लगाओगे हम को हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल तुम तो पागल बनाओगे हम को
Abrar Kashif
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लौट कर नहीं आता कब्र से कोई लेकिन प्यार करने वालों को इंतिज़ार रहता है
Shabeena Adeeb
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शबरी सा बनकर बैठा मैं, तुम बनकर राम चले आना, मीरा सा मैं तुझ को चाहूँ, तुम बनकर श्याम चले आना
Divya 'Kumar Sahab'
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ज़िंदगी भर यूँँ मेरे दिल को दुखाया था बहुत क़ब्र पर आया है वो मुझ से मुआ'फ़ी के लिए
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ज़िंदगी भर मैं बोलूँगा तुझ को इश्क़ का यूँँ दग़ाबाज़ है तू
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वो शहर मेरा क्यूँ छोड़ दिया अब किस को देख के शे'र कहूँ
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ज़िंदगी का हर वरक़ बा-शौक़ पढ़िए ये किताब इक रोज़ लौटानी भी तो है
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वो दर्द भला क्या समझेंगे जो दर्द हमेशा देते हैं
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