ये फ़ुर्क़त रंज ग़म रुसवाई हिजरत हिज्र तन्हाई हैं हम पर ये सभी दौलत मगर ये जी नहीं लगता
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ग़म-ए-फ़ुर्क़त का शिकवा करने वाली मेरी मौजूदगी में सो रही है
Jaun Elia
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तड़पना हिज्र तक सीमित नहीं है उसे दुल्हन भी बनते देखना है
Anand Verma
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शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम ज़िन्दगी है धूप तो मद-मस्त पुर्वाई सी तुम चाहे महफ़िल में रहूँ चाहे अकेले में रहूँ गूँजती रहती हो मुझ में शोख़ शहनाई सी तुम
Kunwar Bechain
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ये जो हिजरत के मारे हुए हैं यहाँ अगले मिसरे पे रो के कहेंगे कि हाँ
Ali Zaryoun
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या'नी कि इश्क़ अपना मुकम्मल नहीं हुआ गर मैं तुम्हारे हिज्र में पागल नहीं हुआ वो शख़्स सालों बा'द भी कितना हसीन है वो रंग कैनवस पे कभी डल नहीं हुआ
Kushal Dauneria
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ज़ुल्म मज़लूमों पे ढाना छोड़ दो हक़ यतीमों का दबाना छोड़ दो ये नहीं कर सकते तो बेहतर है ये सर को सज्दे में झुकाना छोड़ दो
Shajar Abbas
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ज़ुल्म की मिल के क़मर ऐसे करेंगे ख़म सब दूर हो जाएँगे ये अपने वतन से ग़म सब ख़्वाब अज्दाद ने जो देखा है इक दिन उस की देखना ख़ून से ता'बीर लिखेंगे हम सब
Shajar Abbas
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ज़ीस्त जब मौत की आग़ोश में सो जाएगी हर हक़ीक़त मिरी इक वाक़िआ' हो जाएगी
Shajar Abbas
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ज़ेहन के लब पे तिरा नाम है बस शाम-ओ-सहर नक़्श हैं चश्म पे अब तक तिरी तस्वीर के पाँव
Shajar Abbas
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उज़्न में कौकब को पहने माह पर टाके क़मर उस को कहना सब ये उस के ज़ेवरात-ए-हुस्न हैं
Shajar Abbas
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