ये ग़ज़ल ग़ैर मुसलसल है पर इस में मतला है न ही मक़्ता है
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अब मैं सारे जहाँ में हूँ बदनाम अब भी तुम मुझ को जानती हो क्या
Jaun Elia
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कोई दिक़्क़त नहीं है गर तुम्हें उलझा सा लगता हूँ मैं पहली मर्तबा मिलने में सब को ऐसा लगता हूँ ज़रूरी तो नहीं हम साथ हैं तो कोई चक्कर हो वो मेरी दोस्त है और मैं उसे बस अच्छा लगता हूँ
Ali Zaryoun
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सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है
Rahat Indori
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शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे
Rahat Indori
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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याद बनकर लिखा होता दिल पे जो भी एक आँसू वो सब कुछ मिटा आता है
Sahil Verma
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आरज़ू थी ये, कोई लगा ले गले अब मगर सब की बाँहों से डर लगता है
Sahil Verma
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दूर ना जाए कभी तू मुझ सेे साहिल मैं यही भगवान से मिन्नत करूँँगी
Sahil Verma
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मेरे तो पुराने अब वो यार नहीं दिखते और तुम सेे भी मिलने के आसार नहीं दिखते
Sahil Verma
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ठंडी हवा की सोहबत में हो रही बारिश है लगता है ये सर्दी की कोई नई साज़िश है
Sahil Verma
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