यूँँ तो बिछड़ने का वो ग़म था दर्द से भरा हुआ हम दूर भी चले गए और पीछे देखते रहे
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मेहरबाँ हम पे हर इक रात हुआ करती थी आँख लगते ही मुलाक़ात हुआ करती थी हिज्र की रात है और आँख में आँसू भी नहीं ऐसे मौसम में तो बरसात हुआ करती थी
Ismail Raaz
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ये दुख अलग है कि उस सेे मैं दूर हो रहा हूँ ये ग़म जुदा है वो ख़ुद मुझे दूर कर रहा है तेरे बिछड़ने पर लिख रहा हूँ मैं ताज़ा ग़ज़लें ये तेरा ग़म है जो मुझ को मशहूर कर रहा है
Tehzeeb Hafi
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हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है वो हर इक बात पर कहना कि यूँँ होता तो क्या होता
Mirza Ghalib
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सोचूँ तो सारी उम्र मोहब्बत में कट गई देखूँ तो एक शख़्स भी मेरा नहीं हुआ
Jaun Elia
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मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँँ नहीं आता मैं क्या करूँँ के तुझे देखने की आदत है
Ahmad Faraz
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वो अलग किरदार में दिखता है अब आदमी क्यूँ हार में दिखता है अब देख कर दुख होता है दिल को मेरे झूठ हर अख़बार में दिखता है अब
Naviii dar b dar
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वो अलग किरदार में दिखता है अब तो आदमी क्यूँ हार में दिखता है अब तो देख कर दुख होता है दिल को मेरे भी झूठ हर अख़बार में दिखता है अब तो
Naviii dar b dar
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पाने को इक हसीं ख़्वाब का वो नगर बस भटकता रहा यूँँ नवी दर-ब-दर
Naviii dar b dar
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यूँँ तो ज़माने में अच्छी भी तर्बियत रखते हैं कुछ रौशन हो के भी अंधेरे की अहमियत रखते हैं कुछ हैं जानते क़द्र इंसा की दिल से होती यहाँ पर बस इस लिए अब भी दिल में इंसानियत रखते हैं कुछ
Naviii dar b dar
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यूँँ तो ज़माने में अच्छी भी-तर्बियत रखते हैं कुछ रौशन हो के जो अंधेरे की अहमियत रखते हैं कुछ वो जानते क़द्र इंसा की-दिल से होती यहाँ पर बस इस लिए अब भी दिल में-इंसानियत रखते हैं कुछ
Naviii dar b dar
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