जात–मज़हब ये सियासी दायरे हैं हम नहीं आते तुम्हारे दायरे में
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मुद्दतें गुज़र गई 'हिसाब' नहीं किया न जाने अब किस के कितने रह गए हम
Kumar Vishwas
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दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है
Faiz Ahmad Faiz
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कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है तुझ सेे जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
Jawwad Sheikh
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घर में भी दिल नहीं लग रहा काम पर भी नहीं जा रहा जाने क्या ख़ौफ़ है जो तुझे चूम कर भी नहीं जा रहा रात के तीन बजने को है यार ये कैसा महबूब है जो गले भी नहीं लग रहा और घर भी नहीं जा रहा
Tehzeeb Hafi
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अब ज़रूरी तो नहीं है कि वो सब कुछ कह दे दिल में जो कुछ भी हो आँखों से नज़र आता है मैं उस सेे सिर्फ़ ये कहता हूँ कि घर जाना है और वो मारने मरने पे उतर आता है
Tehzeeb Hafi
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ज़माने से ये कहने को कलेजा चाहिए जानाँ तुम्हारे बा'द भी तुम सेे मुहब्बत कर रहा हूँ मैं
Pushpendra Panchal
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मुझ को हीरा कह रहे हो पर न करता हूँ यक़ीं गर जो होता ये सही तो टूटता बिल्कुल नहीं
Pushpendra Panchal
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ज़ाया' किया है वक़्त जो आवारगी में शायद ही लौटेगा कभी वो ज़िन्दगी में इतना गुज़ारा वक़्त मैं ने रौशनी बिन लगने लगा अच्छा मुझे अब तीरगी में
Pushpendra Panchal
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सितारा हूँ मैं अंबर का किसी दिन टूट भी जाऊँ करूँँ पूरी ये मुमकिन है तेरी मैं आख़िरी ख़्वाहिश
Pushpendra Panchal
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वक़्त रोने में फ़क़त बर्बाद मत कर वो न आएगा उसे अब याद मत कर अब ख़ुदा भी हो गया लगता है पत्थर अब ख़ुदा से तू कोई फ़रियाद मत कर
Pushpendra Panchal
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