ज़माने से उलझना छोड़ दो ऐ हिंद के लोगों हमारा काम तो बस मुल्क को आगे बढ़ाना है
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कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा
Allama Iqbal
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इतना संगीन पाप कौन करे मेरे दुख पर विलाप कौन करे चेतना मर चुकी है लोगों की पाप पर पश्चाताप कौन करे
Azhar Iqbal
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वो मुझ को छोड़ के जिस आदमी के पास गया बराबरी का भी होता तो सब्र आ जाता
Parveen Shakir
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और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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ये कहना था उन से मोहब्बत है मुझ को ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं
Khumar Barabankvi
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सभी को एक दिन मरना यहाँ है यही बस सोच कर सब मर रहे हैं
Faizan Faizi
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आप ही बस ख़ास रहबर हैं मिरे कीजिए सरकार अब नज़रे करम है बड़ी हसरत कि आक़ा एक दिन आप का दीदार हो देखूंँ हरम
Faizan Faizi
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मुझे भी बा'द मरने के ख़ुदा जन्नत में डालेगा दुआएँ हैं मिरी हमराह मेरे दोस्त भी जाएँ
Faizan Faizi
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नहीं आता किसी पे दिल हमारा नहीं लगता कोई तुझ सेा हसीं अब
Faizan Faizi
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सुनो मजनूंँ बने फिरते रहोगे यार कब तक तुम हमारा मशवरा है इश्क़ कोई दूसरा कर लो
Faizan Faizi
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