ज़िन्दगी हमें जब उलझन तमाम देती है मौत चैन का फिर दे इक पयाम देती है
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तुम्हारी मौत मेरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा
Zubair Ali Tabish
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देखा है ज़िन्दगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से
Sahir Ludhianvi
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हमें गूंगा न समझा जाए कमतर बोलते हैं हम जहाँ हम को सुना जाए वहीं पर बोलते हैं हम
Bhaskar Shukla
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मौत का भी इलाज हो शायद ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
Firaq Gorakhpuri
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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
Meer Taqi Meer
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ऐ ज़माने मुझे यूँँ न बदनाम कर हो सके तो मुझे उन के ही नाम कर
Shivam Mishra
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जो था क़िस्मत में मेरी वो मिला मुझ को न शिकवा है किसी से नइँ गिला मुझ को
Shivam Mishra
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वो मेरा आशियाँ यूँँ सजा के गया जल रही हर शमा' को बुझा के गया
Shivam Mishra
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शख़्स सब हम को अपने ही दिखते रहे बस तभी हम बिना दाम बिकते रहे
Shivam Mishra
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कोई नहीं है जो छुआ हो रूह को चाहत सभी को जिस्म की ही है रही
Shivam Mishra
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