आदमी आदमी से मिलता है दिल मगर कम किसी से मिलता है भूल जाता हूँ मैं सितम उस के वो कुछ इस सादगी से मिलता है आज क्या बात है कि फूलों का रंग तेरी हँसी से मिलता है सिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत का तेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता है मिल के भी जो कभी नहीं मिलता टूट कर दिल उसी से मिलता है कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं होश जब बे-ख़ुदी से मिलता है रूह को भी मज़ा मोहब्बत का दिल की हम-साएगी से मिलता है
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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किसी लिबास की ख़ुशबू जब उड़ के आती है तेरे बदन की जुदाई बहुत सताती है तेरे गुलाब तरसते हैं तेरी ख़ुशबू को तेरी सफ़ेद चमेली तुझे बुलाती है तेरे बग़ैर मुझे चैन कैसे पड़ता हैं मेरे बगैर तुझे नींद कैसे आती है
Jaun Elia
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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा
Kushal Dauneria
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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किया तअज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास कहाँ तक पहुँचे जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वाइज़ के लिए गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे तू मिरे हाल-ए-परेशाँ पे बहुत तंज़ न कर अपने गेसू भी ज़रा देख कहाँ तक पहुँचे उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे जल्वे बेताब थे जो पर्दा-ए-फ़ितरत में 'जिगर' ख़ुद तड़प कर मिरी चश्म-ए-निगराँ तक पहुँचे
Jigar Moradabadi
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जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा मेरा जब बुरा हाल सुन पाइएगा ख़िरामाँ-ख़िरामाँ चले आइएगा मिटा कर हमें आप पछ्ताइएगा कमी कोई महसूस फ़रमाइएगा नहीं खेल नासेह जुनूँ की हक़ीक़त समझ लीजिएगा तो समझाइएगा हमें भी ये अब देखना है कि हम पर कहाँ तक तवज्जोह न फ़रमाइएगा सितम इश्क़ में आप आसाँ न समझें तड़प जाइएगा जो तड़पाइएगा ये दिल है इसे दिल ही बस रहने दीजे करम कीजिएगा तो पछ्ताइएगा कहीं चुप रही है ज़बान-ए-मोहब्बत न फ़रमाइएगा तो फ़रमाइएगा भुलाना हमारा मुबारक-मुबारक मगर शर्त ये है न याद आइएगा हमें भी न अब चैन आएगा जब तक इन आँखों में आँसू न भर लाइएगा तेरा जज़्बा-ए-शौक़ है बे-हक़ीक़त ज़रा फिर तो इरशाद फ़रमाइएगा हमीं जब न होंगे तो क्या रंग-ए-महफ़िल किसे देख कर आप शरमाइएगा मोहब्बत-मोहब्बत ही रहती है लेकिन कहाँ तक तबीअत को बहलाइएगा न होगा हमारा ही आग़ोश ख़ाली कुछ अपना भी पहलू तही पाइएगा जुनूँ की 'जिगर' कोई हद भी है आख़िर कहाँ तक किसी पर सितम ढाइएगा
Jigar Moradabadi
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अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता टूट पड़ता है दफ़्अ'तन जो इश्क़ बेश-तर देर-पा नहीं होता वो भी होता है एक वक़्त कि जब मा-सिवा मा-सिवा नहीं होता हाए क्या हो गया तबीअ'त को ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता दिल हमारा है या तुम्हारा है हम से ये फ़ैसला नहीं होता जिस पे तेरी नज़र नहीं होती उस की जानिब ख़ुदा नहीं होता मैं कि बे-ज़ार उम्र भर के लिए दिल कि दम-भर जुदा नहीं होता वो हमारे क़रीब होते हैं जब हमारा पता नहीं होता दिल को क्या क्या सुकून होता है जब कोई आसरा नहीं होता हो के इक बार सामना उन से फिर कभी सामना नहीं होता
Jigar Moradabadi
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अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे तो फिर ये कैसे कटे ज़िंदगी कहाँ गुज़रे जो तेरे आरिज़ ओ गेसू के दरमियाँ गुज़रे कभी कभी वही लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे मुझे ये वहम रहा मुद्दतों कि जुरअत-ए-शौक़ कहीं न ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे हर इक मक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिलकश था मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ कशाँ गुज़रे जुनूँ के सख़्त मराहिल भी तेरी याद के साथ हसीं हसीं नज़र आए जवाँ जवाँ गुज़रे मिरी नज़र से तिरी जुस्तुजू के सदक़े में ये इक जहाँ ही नहीं सैंकड़ों जहाँ गुज़रे हुजूम-ए-जल्वा में परवाज़-ए-शौक़ क्या कहना कि जैसे रूह सितारों के दरमियाँ गुज़रे ख़ता मुआ'फ़ ज़माने से बद-गुमाँ हो कर तिरी वफ़ा पे भी क्या क्या हमें गुमाँ गुज़रे मुझे था शिकवा-ए-हिज्राँ कि ये हुआ महसूस मिरे क़रीब से हो कर वो ना-गहाँ गुज़रे रह-ए-वफ़ा में इक ऐसा मक़ाम भी आया कि हम ख़ुद अपनी तरफ़ से भी बद-गुमाँ गुज़रे ख़ुलूस जिस में हो शामिल वो दौर-ए-इश्क़-ओ-हवस न राएगाँ कभी गुज़रा न राएगाँ गुज़रे उसी को कहते हैं जन्नत उसी को दोज़ख़ भी वो ज़िंदगी जो हसीनों के दरमियाँ गुज़रे बहुत हसीन मनाज़िर भी हुस्न-ए-फ़ितरत के न जाने आज तबीअत पे क्यूँँ गिराँ गुज़रे वो जिन के साए से भी बिजलियाँ लरज़ती थीं मिरी नज़र से कुछ ऐसे भी आशियाँ गुज़रे मिरा तो फ़र्ज़ चमन-बंदी-ए-जहाँ है फ़क़त मिरी बला से बहार आए या ख़िज़ाँ गुज़रे कहाँ का हुस्न कि ख़ुद इश्क़ को ख़बर न हुई रह-ए-तलब में कुछ ऐसे भी इम्तिहाँ गुज़रे भरी बहार में ताराजी-ए-चमन मत पूछ ख़ुदा करे न फिर आँखों से वो समाँ गुज़रे कोई न देख सका जिन को वो दिलों के सिवा मुआमलात कुछ ऐसे भी दरमियाँ गुज़रे कभी कभी तो इसी एक मुश्त-ए-ख़ाक के गिर्द तवाफ़ करते हुए हफ़्त आसमाँ गुज़रे बहुत हसीन सही सोहबतें गुलों की मगर वो ज़िंदगी है जो काँटों के दरमियाँ गुज़रे अभी से तुझ को बहुत नागवार हैं हमदम वो हादसात जो अब तक रवाँ-दवाँ गुज़रे जिन्हें कि दीदा-ए-शाइर ही देख सकता है वो इंक़िलाब तिरे सामने कहाँ गुज़रे बहुत अज़ीज़ है मुझ को उन्हें क्या याद 'जिगर' वो हादसात-ए-मोहब्बत जो ना-गहाँ गुज़रे
Jigar Moradabadi
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शाइर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं रूह बन कर ज़र्रे ज़र्रे में समा जाता हूँ मैं आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं जिस क़दर अफ़्साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं और भी बे-गाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं जब मकान-ओ-ला-मकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं अल्लाह अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं तेरी सूरत का जो आईना उसे पाता हूँ मैं अपने दिल पर आप क्या क्या नाज़ फ़रमाता हूँ मैं यक-ब-यक घबरा के जितनी दूर हट आता हूँ मैं और भी उस शोख़ को नज़दीक-तर पाता हूँ मैं मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम मेरी फ़ितरत इज़्तिराब कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं हाए-री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिए मुझ को समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीअत देखना जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं ता-कुजा ये पर्दा-दारी-हा-ए-इश्क़-ओ-लाफ़-ए-हुस्न हाँ सँभल जाएँ दो-आलम होश में आता हूँ मैं मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँँ करें अपनी गर्द-ए-शौक़ में ख़ुद ही छुपा जाता हूँ मैं दिल मुजस्सम शेर-ओ-नग़्मा वो सरापा रंग-ओ-बू क्या फ़ज़ाएँ हैं कि जिन में हल हुआ जाता हूँ मैं ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़ रहम कर मुझ पर कि तेरा राज़ कहलाता हूँ मैं वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़ गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं या वो सूरत ख़ुद जहान-ए-रंग-ओ-बू महकूम था या ये आलम अपने साए से दबा जाता हूँ मैं देखना इस इश्क़ की ये तुरफ़ा-कारी देखना वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शरमाता हूँ मैं एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ 'जिगर' एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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