जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा मेरा जब बुरा हाल सुन पाइएगा ख़िरामाँ-ख़िरामाँ चले आइएगा मिटा कर हमें आप पछ्ताइएगा कमी कोई महसूस फ़रमाइएगा नहीं खेल नासेह जुनूँ की हक़ीक़त समझ लीजिएगा तो समझाइएगा हमें भी ये अब देखना है कि हम पर कहाँ तक तवज्जोह न फ़रमाइएगा सितम इश्क़ में आप आसाँ न समझें तड़प जाइएगा जो तड़पाइएगा ये दिल है इसे दिल ही बस रहने दीजे करम कीजिएगा तो पछ्ताइएगा कहीं चुप रही है ज़बान-ए-मोहब्बत न फ़रमाइएगा तो फ़रमाइएगा भुलाना हमारा मुबारक-मुबारक मगर शर्त ये है न याद आइएगा हमें भी न अब चैन आएगा जब तक इन आँखों में आँसू न भर लाइएगा तेरा जज़्बा-ए-शौक़ है बे-हक़ीक़त ज़रा फिर तो इरशाद फ़रमाइएगा हमीं जब न होंगे तो क्या रंग-ए-महफ़िल किसे देख कर आप शरमाइएगा मोहब्बत-मोहब्बत ही रहती है लेकिन कहाँ तक तबीअत को बहलाइएगा न होगा हमारा ही आग़ोश ख़ाली कुछ अपना भी पहलू तही पाइएगा जुनूँ की 'जिगर' कोई हद भी है आख़िर कहाँ तक किसी पर सितम ढाइएगा
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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अक़्ल ने अच्छे अच्छों को बहकाया था शुक्र है हम पर कुछ वहशत का साया था तुम ने अपनी गर्दन ऊँची ही रक्खी वरना मैं तो माला ले कर आया था मैं अब तक उस के ही रंग में रंगा हूँ जिस ने सब सेे पहले रंग लगाया था मेरी राय सब सेे पहले ली जाए मैं ने सब सेे पहले धोख़ा खाया था सब को इल्म है फूल और ख़ुश्बू दोनों में सब सेे पहले किस ने हाथ छुड़ाया था इक लड़की ने फिर मुझ को बहकाया है इक लड़की ने अच्छे से समझाया था
Zubair Ali Tabish
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अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो
Jaun Elia
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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वो जो रूठें यूँँ मनाना चाहिए ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए ज़िंदगी है नाम ज़ोहद ओ जंग का मौत क्या है भूल जाना चाहिए है इन्हीं धोकों से दिल की ज़िंदगी जो हसीं धोका हो खाना चाहिए लज़्ज़तें हैं दुश्मन-ए-औज-ए-कमाल कुल्फ़तों से जी लगाना चाहिए उन से मिलने को तो क्या कहिए 'जिगर' ख़ुद से मिलने को ज़माना चाहिए
Jigar Moradabadi
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किया तअज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास कहाँ तक पहुँचे जो ज़माने को बुरा कहते हैं ख़ुद हैं वो बुरे काश ये बात तिरे गोश-ए-गिराँ तक पहुँचे बढ़ के रिंदों ने क़दम हज़रत-ए-वाइज़ के लिए गिरते पड़ते जो दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे तू मिरे हाल-ए-परेशाँ पे बहुत तंज़ न कर अपने गेसू भी ज़रा देख कहाँ तक पहुँचे उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे इश्क़ की चोट दिखाने में कहीं आती है कुछ इशारे थे कि जो लफ़्ज़-ओ-बयाँ तक पहुँचे जल्वे बेताब थे जो पर्दा-ए-फ़ितरत में 'जिगर' ख़ुद तड़प कर मिरी चश्म-ए-निगराँ तक पहुँचे
Jigar Moradabadi
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अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा आदमी काम का नहीं होता टूट पड़ता है दफ़्अ'तन जो इश्क़ बेश-तर देर-पा नहीं होता वो भी होता है एक वक़्त कि जब मा-सिवा मा-सिवा नहीं होता हाए क्या हो गया तबीअ'त को ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता दिल हमारा है या तुम्हारा है हम से ये फ़ैसला नहीं होता जिस पे तेरी नज़र नहीं होती उस की जानिब ख़ुदा नहीं होता मैं कि बे-ज़ार उम्र भर के लिए दिल कि दम-भर जुदा नहीं होता वो हमारे क़रीब होते हैं जब हमारा पता नहीं होता दिल को क्या क्या सुकून होता है जब कोई आसरा नहीं होता हो के इक बार सामना उन से फिर कभी सामना नहीं होता
Jigar Moradabadi
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शाइर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं रूह बन कर ज़र्रे ज़र्रे में समा जाता हूँ मैं आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं जिस क़दर अफ़्साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं और भी बे-गाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं जब मकान-ओ-ला-मकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं अल्लाह अल्लाह तुझ को ख़ुद अपनी जगह पाता हूँ मैं तेरी सूरत का जो आईना उसे पाता हूँ मैं अपने दिल पर आप क्या क्या नाज़ फ़रमाता हूँ मैं यक-ब-यक घबरा के जितनी दूर हट आता हूँ मैं और भी उस शोख़ को नज़दीक-तर पाता हूँ मैं मेरी हस्ती शौक़-ए-पैहम मेरी फ़ितरत इज़्तिराब कोई मंज़िल हो मगर गुज़रा चला जाता हूँ मैं हाए-री मजबूरियाँ तर्क-ए-मोहब्बत के लिए मुझ को समझाते हैं वो और उन को समझाता हूँ मैं मेरी हिम्मत देखना मेरी तबीअत देखना जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं हुस्न को क्या दुश्मनी है इश्क़ को क्या बैर है अपने ही क़दमों की ख़ुद ही ठोकरें खाता हूँ मैं तेरी महफ़िल तेरे जल्वे फिर तक़ाज़ा क्या ज़रूर ले उठा जाता हूँ ज़ालिम ले चला जाता हूँ मैं ता-कुजा ये पर्दा-दारी-हा-ए-इश्क़-ओ-लाफ़-ए-हुस्न हाँ सँभल जाएँ दो-आलम होश में आता हूँ मैं मेरी ख़ातिर अब वो तकलीफ़-ए-तजल्ली क्यूँँ करें अपनी गर्द-ए-शौक़ में ख़ुद ही छुपा जाता हूँ मैं दिल मुजस्सम शेर-ओ-नग़्मा वो सरापा रंग-ओ-बू क्या फ़ज़ाएँ हैं कि जिन में हल हुआ जाता हूँ मैं ता-कुजा ज़ब्त-ए-मोहब्बत ता-कुजा दर्द-ए-फ़िराक़ रहम कर मुझ पर कि तेरा राज़ कहलाता हूँ मैं वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़ गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं या वो सूरत ख़ुद जहान-ए-रंग-ओ-बू महकूम था या ये आलम अपने साए से दबा जाता हूँ मैं देखना इस इश्क़ की ये तुरफ़ा-कारी देखना वो जफ़ा करते हैं मुझ पर और शरमाता हूँ मैं एक दिल है और तूफ़ान-ए-हवादिस ऐ 'जिगर' एक शीशा है कि हर पत्थर से टकराता हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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इश्क़ को बे-नक़ाब होना था आप अपना जवाब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं हाँ मुझी को ख़राब होना था आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले हो चुका जो इताब होना था कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया जिस को ख़ाना-ख़राब होना था मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब होना था दिल कि जिस पर हैं नक़्श-ए-रंगा-रंग उस को सादा किताब होना था हम ने नाकामियों को ढूँड लिया आख़िरश कामयाब होना था हाए वो लम्हा-ए-सुकूँ कि जिसे महशर-ए-इज़्तिराब होना था निगह-ए-यार ख़ुद तड़प उठती शर्त-ए-अव्वल ख़राब होना था क्यूँँ न होता सितम भी बे-पायाँ करम-ए-बे-हिसाब होना था क्यूँँ नज़र हैरतों में डूब गई मौज-ए-सद-इज़्तिराब होना था हो चुका रोज़-ए-अव्वलीं ही 'जिगर' जिस को जितना ख़राब होना था
Jigar Moradabadi
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