आज सोचा तो आँसू भर आए मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा उन की महफ़िल से हम उठ तो आए रह गई ज़िंदगी दर्द बन के दर्द दिल में छुपाए छुपाए दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं याद इतना भी कोई न आए
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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मंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों को भी अपना नहीं कहते कम-हिम्मती ख़तरा है समुंदर के सफ़र में तूफ़ान को हम दोस्तो ख़तरा नहीं कहते बन जाए अगर बात तो सब कहते हैं क्या क्या और बात बिगड़ जाए तो क्या क्या नहीं कहते
Nawaz Deobandi
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मैं ने तो बस मज़ाक़ में पूछा ख़राब है? वो पीर हाथ देख के बोला ख़राब है हर दिन उसे दिखाया कि कितने शरीफ़ हैं हर रात उस के बारे में सोचा ख़राब है ये इश्क़ हो चुका है तुरुप-चाल ताश की आगे ग़ुलाम के मिरा इक्का ख़राब है आज़ाद लड़कियों से भली क़ैद औरतें मतलब कि झील ठीक है दरिया ख़राब है हम जिस ख़ुदा की आस में बैठे हैं रात दिन वो जा चुका है बोल के दुनिया ख़राब है ज़्यादा किसी की मौत पे रोना नहीं सही और जन्मदिन पे शोर शराबा ख़राब है आधा भी उस के जितना मैं रौशन नहीं हुआ मैं जिस दिए को बोल रहा था ख़राब है
Kushal Dauneria
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मुझ पे हैं सैकड़ों इल्ज़ाम मिरे साथ न चल तू भी हो जाएगा बदनाम मिरे साथ न चल तू नई सुब्ह के सूरज की है उजली सी किरन मैं हूँ इक धूल भरी शाम मिरे साथ न चल अपनी ख़ुशियाँ मिरे आलाम से मंसूब न कर मुझ से मत माँग मिरा नाम मिरे साथ न चल तू भी खो जाएगी टपके हुए आँसू की तरह देख ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मिरे साथ न चल मेरी दीवार को तू कितना सँभालेगा 'शकील' टूटता रहता हूँ हर गाम मिरे साथ न चल
Shakeel Azmi
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तुम इस ख़राबे में चार छे दिन टहल गई हो सो ऐन-मुमकिन है दिल की हालत बदल गई हो तमाम दिन इस दुआ में कटता है कुछ दिनों से मैं जाऊँ कमरे में तो उदासी निकल गई हो किसी के आने पे ऐसे हलचल हुई है मुझ में ख़मोश जंगल में जैसे बंदूक़ चल गई हो ये न हो गर मैं हिलूँ तो गिरने लगे बुरादा दुखों की दीमक बदन की लकड़ी निगल गई हो ये छोटे छोटे कई हवादिस जो हो रहे हैं किसी के सर से बड़ी मुसीबत न टल गई हो हमारा मलबा हमारे क़दमों में आ गिरा है प्लेट में जैसे मोम-बत्ती पिघल गई हो
Umair Najmi
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जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा
Kaifi Azmi
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लाई फिर इक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना तेरे शहर में फिर बनेंगी मस्जिदें मय-ख़ाना तेरे शहर में आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में शाह-ना में लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर हर जगह है दफ़्न इक अफ़्साना तेरे शहर में कुछ कनीज़ें जो हरीम-ए-नाज़ में हैं बारयाब माँगती हैं जान ओ दिल नज़राना तेरे शहर में नंगी सड़कों पर भटक कर देख जब मरती है रात रेंगता है हर तरफ़ वीराना तेरे शहर में
Kaifi Azmi
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तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो आँखों में नमी हँसी लबों पर क्या हाल है क्या दिखा रहे हो बन जाएँगे ज़हर पीते पीते ये अश्क जो पीते जा रहे हो जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है तुम क्यूँँ उन्हें छेड़े जा रहे हो रेखाओं का खेल है मुक़द्दर रेखाओं से मात खा रहे हो
Kaifi Azmi
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हाथ आ कर लगा गया कोई मेरा छप्पर उठा गया कोई लग गया इक मशीन में मैं भी शहर में ले के आ गया कोई मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी इश्तिहार इक लगा गया कोई ये सदी धूप को तरसती है जैसे सूरज को खा गया कोई ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी बेच के अपना खा गया कोई अब वो अरमान हैं न वो सपने सब कबूतर उड़ा गया कोई वो गए जब से ऐसा लगता है छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई मेरा बचपन भी साथ ले आया गाँव से जब भी आ गया कोई
Kaifi Azmi
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की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे हम ने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ रक़्स-ए-सबा के जश्न में हम तुम भी नाचते ऐ काश तुम भी आ गए होते सबा के साथ इक्कीसवीं सदी की तरफ़ हम चले तो हैं फ़ित्ने भी जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ
Kaifi Azmi
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