ghazalKuch Alfaaz

आँखों से इक ख़्वाब गुज़रने वाला है खिड़की से महताब गुज़रने वाला है सदियों के इन ख़्वाब-गज़ीदा शहरों से महर-ए-आलम-ताब गुज़रने वाला है जादूगर की क़ैद में थे जब शहज़ादे क़िस्से का वो बाब गुज़रने वाला है सन्नाटे की दहशत बढ़ती जाती है बस्ती से सैलाब गुज़रने वाला है दरियाओं में रेत उड़ेगी सहरा की सहरा से गिर्दाब गुज़रने वाला है मौला जाने कब देखेंगे आँखों से जो मौसम शादाब गुज़रने वाला है हस्ती 'अमजद' दीवाने का ख़्वाब सही अब तो ये भी ख़्वाब गुज़रने वाला है

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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पर्दे में लाख फिर भी नुमूदार कौन है है जिस के दम से गर्मी-ए-बाज़ार कौन है वो सामने है फिर भी दिखाई न दे सके मेरे और उस के बीच ये दीवार कौन है बाग़-ए-वफ़ा में हो नहीं सकता ये फ़ैसला सय्याद याँ पे कौन गिरफ़्तार कौन है माना नज़र के सामने है बे-शुमार धुँद है देखना कि धुँद के इस पार कौन है कुछ भी नहीं है पास पे रहता है फिर भी ख़ुश सब कुछ है जिस के पास वो बेज़ार कौन है यूँँ तो दिखाई देते हैं असरार हर तरफ़ खुलता नहीं कि साहिब-ए-असरार कौन है 'अमजद' अलग सी आप ने खोली है जो दुकाँ जिंस-ए-हुनर का याँ ये ख़रीदार कौन है

Amjad Islam Amjad

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आईनों में अक्स न हों तो हैरत रहती है जैसे ख़ाली आँखों में भी वहशत रहती है हर दम दुनिया के हंगा में घेरे रखते थे जब से तेरे ध्यान लगे हैं फ़ुर्सत रहती है करनी है तो खुल के करो इंकार-ए-वफ़ा की बात बात अधूरी रह जाए तो हसरत रहती है शहर-ए-सुख़न में ऐसा कुछ कर इज़्ज़त बन जाए सब कुछ मिट्टी हो जाता है इज़्ज़त रहती है बनते बनते ढह जाती है दिल की हर तामीर ख़्वाहिश के बहरूप में शायद क़िस्मत रहती है साए लरज़ते रहते हैं शहरों की गलियों में रहते थे इंसान जहाँ अब दहशत रहती है मौसम कोई ख़ुशबू ले कर आते जाते हैं क्या क्या हम को रात गए तक वहशत रहती है ध्यान में मेला सा लगता है बीती यादों का अक्सर उस के ग़म से दिल की सोहबत रहती है फूलों की तख़्ती पर जैसे रंगों की तहरीर लौह-ए-सुख़न पर ऐसे 'अमजद' शोहरत रहती है

Amjad Islam Amjad

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निकल के हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहरस जाएँ कहीं ज़मीं के साथ न मिल जाएँ ये ख़लाएँ कहीं सफ़र की रात है पिछली कहानियाँ न कहो रुतों के साथ पलटती हैं कब हवाएँ कहीं फ़ज़ा में तैरते रहते हैं नक़्श से क्या क्या मुझे तलाश न करती हों ये बलाएँ कहीं हवा है तेज़ चराग़-ए-वफ़ा का ज़िक्र तो क्या तनाबें ख़ेमा-ए-जाँ की न टूट जाएँ कहीं मैं ओस बन के गुल-ए-हर्फ़ पर चमकता हूँ निकलने वाला है सूरज मुझे छुपाएँ कहीं मिरे वजूद पे उतरी हैं लफ़्ज़ की सूरत भटक रही थीं ख़लाओं में ये सदाएँ कहीं हवा का लम्स है पाँव में बेड़ियों की तरह शफ़क़ की आँच से आँखें पिघल न जाएँ कहीं रुका हुआ है सितारों का कारवाँ 'अमजद' चराग़ अपने लहू से ही अब जलाएँ कहीं

Amjad Islam Amjad

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भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा बात तो कुछ भी नहीं थीं लेकिन उस का एक दम हाथ को होंटों पे रख कर रोकना अच्छा लगा चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत ज़ेर-ए-लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा दिल में कितने अहद बाँधे थे भुलाने के उसे वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा बे-इरादा लम्स की वो सनसनी प्यारी लगी कम तवज्जोह आँख का वो देखना अच्छा लगा नीम-शब की ख़ामोशी में भीगती सड़कों पे कल तेरी यादों के जिलौ में घूमना अच्छा लगा इस अदू-ए-जाँ को 'अमजद' मैं बुरा कैसे कहूँ जब भी आया सामने वो बे-वफ़ा अच्छा लगा

Amjad Islam Amjad

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रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं कल मैं जब जाने लगा तो उस ने क्यूँँ रोका नहीं यूँँ अगर सोचूँ तो इक इक नक़्श है सीने पे नक़्श हाए वो चेहरा कि फिर भी आँख में बनता नहीं क्यूँँ उड़ाती फिर रही है दर-ब-दर मुझ को हवा मैं अगर इक शाख़ से टूटा हुआ पत्ता नहीं आज तन्हा हूँ तो कितना अजनबी माहौल है एक भी रस्ते ने तेरे शहर में रोका नहीं हर्फ़ बर्ग-ए-ख़ुश्क बन कर टूटते गिरते रहे ग़ुंचा-ए-अर्ज़-ए-तमन्ना होंट पर फूटा नहीं दर्द का रस्ता है या है साअ'त-ए-रोज़-ए-हिसाब सैकड़ों लोगों को रोका एक भी ठहरा नहीं शबनमी आँखों के जुगनू काँपते होंटों के फूल एक लम्हा था जो 'अमजद' आज तक गुज़रा नहीं

Amjad Islam Amjad

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