ghazalKuch Alfaaz

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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याद तब करते हो करने को न हो जब कुछ भी और कहते हो तुम्हें इश्क़ है मतलब कुछ भी अब जो आ आ के बताते हो वो शख़्स ऐसा था जब मेरे साथ था वो क्यूँँ न कहा तब कुछ भी वक्फ़े-वक्फ़े से मुझे देखने आते रहना हिज्र की शब है सो हो सकता है इस शब कुछ भी

Umair Najmi

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इश्क़ में दान करना पड़ता है जाँ को हलकान करना पड़ता है तजरबा मुफ़्त में नहीं मिलता पहले नुक़सान करना पड़ता है उस की बे-लफ़्ज़ गुफ़्तुगू के लिए आँख को कान करना पड़ता है फिर उदासी के भी तक़ाज़े हैं घर को वीरान करना पड़ता है

Mehshar Afridi

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तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ कभी कहता हूँ उस को याद रखना ठीक होगा मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ कोई कब तक किसी की बे-वफ़ाई याद रक्खे बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद' कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ

Jawwad Sheikh

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छाँव मिल जाए तो कम दाम में बिक जाती है अब थकन थोड़े से आराम में बिक जाती है आप क्या मुझ को नवाज़ेंगे जनाब-ए-आली सल्तनत तक मिरे इनआ'म में बिक जाती है शे'र जैसा भी हो इस शहर में पढ़ सकते हो चाय जैसी भी हो आसाम में बिक जाती है वो सियासत का इलाक़ा है उधर मत जाना आबरू कूचा-ए-बद-नाम में बिक जाती है

Munawwar Rana

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ये बुत जो हम ने दोबारा बना के रक्खा है इसी ने हम को तमाशा बना के रक्खा है वो किस तरह हमें इनआ'म से नवाज़ेगा वो जिस ने हाथों को कासा बना के रक्खा है यहाँ पे कोई बचाने तुम्हें न आएगा समुंदरों ने जज़ीरा बना के रक्खा है तमाम उम्र का हासिल है ये हुनर मेरा कि मैं ने शीशे को हीरा बना के रक्खा है किसे किसे अभी सज्दा-गुज़ार होना है अमीर-ए-शहर ने खाता बना के रक्खा है मैं बच गया तो यक़ीनन ये मो'जिज़ा होगा सभी ने मुझ को निशाना बना के रक्खा है कोई बता दे ये सूरज को जा के हम ने भी शजर को धूप में छाता बना के रक्खा है

Munawwar Rana

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ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा सय्याद मुझे मैं हूँ सरहद पे बने एक मकाँ की सूरत कब तलक देखिए रखता है वो आबाद मुझे एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे कम से कम ये तो बता दे कि किधर जाएगी कर के ऐ ख़ाना-ख़राबी मिरी बर्बाद मुझे मैं समझ जाता हूँ इस में कोई कमज़ोरी है मेरे जिस शे'र पे मिलती है बहुत दाद मुझे

Munawwar Rana

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दुनिया तिरी रौनक़ से मैं अब ऊब रहा हूँ तू चाँद मुझे कहती थी मैं डूब रहा हूँ अब कोई शनासा भी दिखाई नहीं देता बरसों मैं इसी शहर का महबूब रहा हूँ मैं ख़्वाब नहीं आप की आँखों की तरह था मैं आप का लहजा नहीं उस्लूब रहा हूँ रुस्वाई मिरे नाम से मंसूब रही है मैं ख़ुद कहाँ रुस्वाई से मंसूब रहा हूँ सच्चाई तो ये है कि तिरे क़र्या-ए-दिल में इक वो भी ज़माना था कि मैं ख़ूब रहा हूँ उस शहर के पत्थर भी गवाही मिरी देंगे सहरा भी बता देगा कि मज्ज़ूब रहा हूँ दुनिया मुझे साहिल से खड़ी देख रही है मैं एक जज़ीरे की तरह डूब रहा हूँ शोहरत मुझे मिलती है तो चुप-चाप खड़ी रह रुस्वाई मैं तुझ से भी तो मंसूब रहा हूँ फेंक आए थे मुझ को भी मिरे भाई कुएँ में मैं सब्र में भी हज़रत-ए-अय्यूब रहा हूँ

Munawwar Rana

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मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ मैं कच्ची मिट्टी की सूरत हूँ तेरे हाथों में मुझे तू ढाल दे ऐसे कि मो'तबर हो जाऊँ बची-खुची हुई साँसों के साथ पहुँचाना सुनो हवाओ अगर मैं शिकस्ता-पर हो जाऊँ

Munawwar Rana

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