ghazalKuch Alfaaz

आशियाँ जल गया, गुल्सिताँ लुट गया, हम क़फ़स से निकल कर किधर जाएँगे इतने मानूस सय्याद से हो गए, अब रिहाई मिलेगी तो मर जाएँगे और कुछ दिन ये दस्तूर-ए-मय-ख़ाना है, तिश्ना-कामी के ये दिन गुज़र जाएँगे मेरे साक़ी को नज़रें उठाने तो दो, जितने ख़ाली हैं सब जाम भर जाएँगे ऐ नसीम-ए-सहर तुझ को उन की क़सम, उन से जा कर न कहना मिरा हाल-ए-ग़म अपने मिटने का ग़म तो नहीं है मगर, डर ये है उन के गेसू बिखर जाएँगे अश्क-ए-ग़म ले के आख़िर किधर जाएँ हम, आँसुओं की यहाँ कोई क़ीमत नहीं आप ही अपना दामन बढ़ा दीजिए, वर्ना मोती ज़मीं पर बिखर जाएँगे काले काले वो गेसू शिकन-दर-शिकन, वो तबस्सुम का आलम चमन-दर-चमन खींच ली उन की तस्वीर दिल ने मिरे, अब वो दामन बचा कर किधर जाएँगे

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इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं सब के दिल से उतर गया हूँ मैं कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँँ सुन रहा हूँ कि घर गया हूँ मैं क्या बताऊँ कि मर नहीं पाता जीते-जी जब से मर गया हूँ मैं अब है बस अपना सामना दर-पेश हर किसी से गुज़र गया हूँ मैं वही नाज़-ओ-अदा वही ग़म्ज़े सर-ब-सर आप पर गया हूँ मैं अजब इल्ज़ाम हूँ ज़माने का कि यहाँ सब के सर गया हूँ मैं कभी ख़ुद तक पहुँच नहीं पाया जब कि वाँ उम्र भर गया हूँ मैं तुम से जानाँ मिला हूँ जिस दिन से बे-तरह ख़ुद से डर गया हूँ मैं कू-ए-जानाँ में सोग बरपा है कि अचानक सुधर गया हूँ मैं

Jaun Elia

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एक और शख़्स छोड़ कर चला गया तो क्या हुआ हमारे साथ कौन सा ये पहली मर्तबा हुआ अज़ल से इन हथेलियों में हिज्र की लकीर थी तुम्हारा दुख तो जैसे मेरे हाथ में बड़ा हुआ मेरे ख़िलाफ़ दुश्मनों की सफ़ में है वो और मैं बहुत बुरा लगूँगा उस पर तीर खींचता हुआ

Tehzeeb Hafi

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

Ahmad Faraz

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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यही वफ़ा का सिला है तो कोई बात नहीं ये दर्द तुम ने दिया है तो कोई बात नहीं यही बहुत है कि तुम देखते हो साहिल से सफ़ीना डूब रहा है तो कोई बात नहीं ये फ़िक्र है कहीं तुम भी न साथ छोड़ चलो जहाँ ने छोड़ दिया है तो कोई बात नहीं तुम्हीं ने आइना-ए-दिल मिरा बनाया था तुम्हीं ने तोड़ दिया है तो कोई बात नहीं किसे मजाल कहे कोई मुझ को दीवाना अगर ये तुम ने कहा है तो कोई बात नहीं

Raaz Allahabadi

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लज़्ज़त-ए-ग़म बढ़ा दीजिए आप फिर मुस्कुरा दीजिए चाँद कब तक गहन में रहे अब तो ज़ुल्फ़ें हटा दीजिए मेरा दामन बहुत साफ़ है कोई तोहमत लगा दीजिए क़ीमत-ए-दिल बता दीजिए ख़ाक ले कर उड़ा दीजिए आप अँधेरे में कब तक रहें फिर कोई घर जला दीजिए इक समुंदर ने आवाज़ दी मुझ को पानी पिला दीजिए

Raaz Allahabadi

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