ghazalKuch Alfaaz

अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है मुझ को दुश्मन से नहीं यार से डर लगता है कैसे दुश्मन के मुक़ाबिल वो ठहर पाएगा जिस को टूटी हुई तलवार से डर लगता है वो जो पाज़ेब की झंकार का शैदाई हो उस को तलवार की झंकार से डर लगता है मुझ को बालों की सफ़ेदी ने ख़बर-दार किया ज़िंदगी अब तिरी रफ़्तार से डर लगता है कर दें मस्लूब उन्हें लाख ज़माने वाले हक़-परस्तों को कहाँ दार से डर लगता है वो किसी तरह भी तैराक नहीं हो सकता दूर से ही जिसे मँझधार से डर लगता है मेरे आँगन में है वहशत का बसेरा 'अफ़ज़ल' मुझ को घर के दर-ओ-दीवार से डर लगता है

Related Ghazal

चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

105 likes

तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

81 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

130 likes

More from Afzal Allahabadi

जो मिरी आरज़ू नहीं करता उस की मैं जुस्तुजू नहीं करता हिज्र-ए-जानाँ में अपने अश्कों से कौन है जो वुज़ू नहीं करता वो तो तेरा कलीम था वर्ना सब से तू गुफ़्तुगू नहीं करता सय्यद-उल-अम्बिया थे वो वर्ना सब को तू रू-ब-रू नहीं करता तेरी निस्बत मिली मुझे जब से मैं कोई आरज़ू नहीं करता हर घड़ी जिस की बात करता हूँ मुझ से वो गुफ़्तुगू नहीं करता दर-ब-दर यूँँ नहीं भटकता मैं जो फ़रामोश तू नहीं करता हो नहीं पाती शा'इरी 'अफ़ज़ल' नज़्र जब तक लहू नहीं करता

Afzal Allahabadi

1 likes

ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो नशा है जिस में सुख़न का वही शराब है वो उसे न देख महकता हुआ गुलाब है वो न जाने कितनी निगाहों का इंतिख़ाब है वो मिसाल मिल न सकी काएनात में उस की जवाब उस का नहीं कोई ला-जवाब है वो मिरी इन आँखों को ता'बीर मिल नहीं पाती जिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा ख़्वाब है वो न जाने कितने हिजाबों में वो छुपा है मगर निगाह-ए-दिल से जो देखूँ तो बे-हिजाब है वो उजाले अपने लुटा कर वो डूब जाएगा हसीन सुब्ह का रख़्शंदा आफ़्ताब है वो वो मुझ से पूछने आया है मेरा हाल 'अफ़ज़ल' जिसे बता न सकूँ दिल में इज़्तिराब है वो

Afzal Allahabadi

1 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Afzal Allahabadi.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Afzal Allahabadi's ghazal.