ghazalKuch Alfaaz

जो मिरी आरज़ू नहीं करता उस की मैं जुस्तुजू नहीं करता हिज्र-ए-जानाँ में अपने अश्कों से कौन है जो वुज़ू नहीं करता वो तो तेरा कलीम था वर्ना सब से तू गुफ़्तुगू नहीं करता सय्यद-उल-अम्बिया थे वो वर्ना सब को तू रू-ब-रू नहीं करता तेरी निस्बत मिली मुझे जब से मैं कोई आरज़ू नहीं करता हर घड़ी जिस की बात करता हूँ मुझ से वो गुफ़्तुगू नहीं करता दर-ब-दर यूँँ नहीं भटकता मैं जो फ़रामोश तू नहीं करता हो नहीं पाती शा'इरी 'अफ़ज़ल' नज़्र जब तक लहू नहीं करता

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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

Waseem Barelvi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ग़ज़ल का हुस्न है और गीत का शबाब है वो नशा है जिस में सुख़न का वही शराब है वो उसे न देख महकता हुआ गुलाब है वो न जाने कितनी निगाहों का इंतिख़ाब है वो मिसाल मिल न सकी काएनात में उस की जवाब उस का नहीं कोई ला-जवाब है वो मिरी इन आँखों को ता'बीर मिल नहीं पाती जिसे मैं देखता रहता हूँ ऐसा ख़्वाब है वो न जाने कितने हिजाबों में वो छुपा है मगर निगाह-ए-दिल से जो देखूँ तो बे-हिजाब है वो उजाले अपने लुटा कर वो डूब जाएगा हसीन सुब्ह का रख़्शंदा आफ़्ताब है वो वो मुझ से पूछने आया है मेरा हाल 'अफ़ज़ल' जिसे बता न सकूँ दिल में इज़्तिराब है वो

Afzal Allahabadi

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अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है मुझ को दुश्मन से नहीं यार से डर लगता है कैसे दुश्मन के मुक़ाबिल वो ठहर पाएगा जिस को टूटी हुई तलवार से डर लगता है वो जो पाज़ेब की झंकार का शैदाई हो उस को तलवार की झंकार से डर लगता है मुझ को बालों की सफ़ेदी ने ख़बर-दार किया ज़िंदगी अब तिरी रफ़्तार से डर लगता है कर दें मस्लूब उन्हें लाख ज़माने वाले हक़-परस्तों को कहाँ दार से डर लगता है वो किसी तरह भी तैराक नहीं हो सकता दूर से ही जिसे मँझधार से डर लगता है मेरे आँगन में है वहशत का बसेरा 'अफ़ज़ल' मुझ को घर के दर-ओ-दीवार से डर लगता है

Afzal Allahabadi

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