ghazalKuch Alfaaz

ab to mazhab koi aisa bhi chalaya jaae jis men insan ko insan banaya jaae jis ki khushbu se mahak jaae padosi ka bhi ghar phuul is qism ka har samt khilaya jaae aag bahti hai yahan ganga men jhelam men bhi koi batlae kahan ja ke nahaya jaae pyaar ka khuun hua kyuun ye samajhne ke liye har andhere ko ujale men bulaya jaae mere dukh-dard ka tujh par ho asar kuchh aisa main rahun bhuka to tujh se bhi na khaya jaae jism do ho ke bhi dil ek hon apne aise mera aansu teri palkon se uthaya jaae giit anman hai ghhazal chup hai rubai hai dukhi aise mahaul men 'niraj' ko bulaya jaae ab to mazhab koi aisa bhi chalaya jae jis mein insan ko insan banaya jae jis ki khushbu se mahak jae padosi ka bhi ghar phul is qism ka har samt khilaya jae aag bahti hai yahan ganga mein jhelam mein bhi koi batlae kahan ja ke nahaya jae pyar ka khun hua kyun ye samajhne ke liye har andhere ko ujale mein bulaya jae mere dukh-dard ka tujh par ho asar kuchh aisa main rahun bhuka to tujh se bhi na khaya jae jism do ho ke bhi dil ek hon apne aise mera aansu teri palkon se uthaya jae git anman hai ghazal chup hai rubai hai dukhi aise mahaul mein 'niraj' ko bulaya jae

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह याद आएँगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह ज़िक्र जिस दम भी छिड़ा उन की गली में मेरा जाने शरमाए वो क्यूँँ गाँव की दुल्हन की तरह मेरे घर कोई ख़ुशी आती तो कैसे आती उम्र-भर साथ रहा दर्द महाजन की तरह कोई कंघी न मिली जिस से सुलझ पाती वो ज़िंदगी उलझी रही ब्रम्हा के दर्शन की तरह दाग़ मुझ में है कि तुझ में ये पता तब होगा मौत जब आएगी कपड़े लिए धोबन की तरह हर किसी शख़्स की क़िस्मत का यही है क़िस्सा आए राजा की तरह जाए वो निर्धन की तरह जिस में इंसान के दिल की न हो धड़कन 'नीरज' शाइ'री तो है वो अख़बार के कतरन की तरह

Gopaldas Neeraj

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बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा ख़रीदने को जिसे कम थी दौलत-ए-दुनिया किसी कबीर की मुट्ठी में वो रतन देखा मुझे मिला है वहाँ अपना ही बदन ज़ख़्मी कहीं जो तीर से घाइल कोई हिरन देखा बड़ा न छोटा कोई फ़र्क़ बस नज़र का है सभी पे चलते समय एक सा कफ़न देखा ज़बाँ है और बयाँ और उस का मतलब और अजीब आज की दुनिया का व्याकरन देखा लुटेरे डाकू भी अपने पे नाज़ करने लगे उन्होंने आज जो संतों का आचरन देखा जो सादगी है कुहन में हमारे ऐ 'नीरज' किसी पे और भी क्या ऐसा बाँकपन देखा

Gopaldas Neeraj

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अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुज़री था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई ज़िंदगी भर तो हुई गुफ़्तुगू ग़ैरों से मगर आज तक हम से हमारी न मुलाक़ात हुई हर ग़लत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझ को एक आवाज़ तिरी जब से मिरे साथ हुई मैं ने सोचा कि मिरे देश की हालत क्या है एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई

Gopaldas Neeraj

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