ghazalKuch Alfaaz

अभी अपने मर्तबा-ए-हुस्न से मियाँ बा-ख़बर तू हुआ नहीं कि ग़ज़ल-सरा तिरे बाग़ में कोई मुर्ग़-ए-ताज़ा-नवा नहीं जो गली में यार की जाऊँ हूँ तो अजल कहे है ये रहम खा तू सितम-रसीदा न जा उधर कोई ज़िंदा वाँ से फिरा नहीं वो ग़रीब-ओ-बे-कस-ओ-ज़ार था तुझे उस का देता हूँ मैं पता तिरे कुश्ता का वो मज़ार था कि चराग़ जिस में जला नहीं जो हकीम पास मैं जाऊँ हूँ तो वो दोस्ती से सुनाए है तू मआश की भी तलाश कर ये मक़ाम-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ना नहीं मुझे इश्क़ रखता है सर-निगूँ मिरा जाल पूछो न क्या कहूँ मैं हबाब-ए-बहर का शीशा हूँ मिरे टूटने की सदा नहीं तिरे ख़ाकसारों ने अपना सर नहीं पीटा दश्त में इस क़दर कि बगूला वाँ से ग़ुबार का तरफ़ आसमाँ के गया नहीं न नसीम-ए-बाग़-ओ-बहार हूँ न फ़िदा-ए-रू-ए-निगार हूँ मैं ग़रीब-ए-शहर-ओ-दयार हूँ मिरी दैर ओ का'बा में जा नहीं तिरे नख़्ल-ए-हुस्न की कोंपलें अभी ना-शगुफ़्ता हैं ऐ परी जो नसीम आई है उस ने भी इन्हें कुछ समझ के छुआ नहीं तिरे गेसुओं में जो जाती है तो मिरा ही हाल कह आती है मिरी ख़स्म-ए-जाँ भी तो इस क़दर ये नसीम-ए-नाफ़ा-कुशा नहीं न मैं रहने वाला हूँ बाग़ का न सफ़ीर-संज हूँ राग का मुझे ढूँडे है सो वो किस जगह कहीं आशियान-ए-हुमा नहीं कोई ज़ख़्म-ख़ुर्दा है ख़ार का कोई ख़ूँ-तपीदा बहार का है मिरा ही हौसला 'मुसहफ़ी' कि किसी से मुझ को गिला नहीं

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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अश्क-ए-नादाँ से कहो बा'द में पछताएँगे आप गिरकर मेरी आँखों से किधर जाएँगे अपने लफ़्ज़ों को तकल्लुम से गिरा कर जाना अपने लहजे की थकावट में बिखर जाएँगे इक तेरा घर था मेरी हद-ए-मुसाफ़ित लेकिन अब ये सोचा है कि हम हद से गुज़र जाएँगे अपने अफ़्कार जला डालेंगे काग़ज़ काग़ज़ सोच मर जाएगी तो हम आप भी मर जाएँगे इस सेे पहले कि जुदाई की ख़बर तुम सेे मिले हम ने सोचा है कि हम तुम सेे बिछड़ जाएँगे

Khalil Ur Rehman Qamar

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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मैं ने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझ को ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं मैं ने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

Jawwad Sheikh

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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ख़्वाब था या ख़याल था क्या था हिज्र था या विसाल था क्या था मेरे पहलू में रात जा कर वो माह था या हिलाल था क्या था चमकी बिजली सी पर न समझे हम हुस्न था या जमाल था क्या था शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था वज्द था या वो हाल था क्या था जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे माह था या वो साल था क्या था 'मुसहफ़ी' शब जो चुप तू बैठा था क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

Mushafi Ghulam Hamdani

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जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे ऐसा शिकोह उस की सूरत में है कि नागह आवे जो सामने से दस्त-ए-मजाल बाँधे आँखों से गर करे वो ज़ुल्फ़ों को टुक इशारा आवें चले हज़ारों वहशी ग़ज़ाल बाँधे ईसा ओ ख़िज़्र तक भी पहुँचे अजल का मुज़्दा तू तेग़ अगर कमर पर बहर-ए-क़िताल बाँधे लाले की शाख़ हरगिज़ लहके न फिर चमन में गर सर पे सुर्ख़ चीरा वो नौनिहाल बाँधे लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से गो बादशाह डाँडे गो कोतवाल बाँधे हम किस तरह से देखें जब दे दे पेच लड़ के चीरे के पेचों में तो ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे बंदा हूँ मैं तो उस की आँखों की साहिरी का तार-ए-नज़र से जिस ने साहब-कमाल बाँधे हम एक बोसे के भी ममनूँ नहीं किसी के चाहे सो कोई तोहमत रोज़-ए-विसाल बाँधे सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे

Mushafi Ghulam Hamdani

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