ghazalKuch Alfaaz

जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे ऐसा शिकोह उस की सूरत में है कि नागह आवे जो सामने से दस्त-ए-मजाल बाँधे आँखों से गर करे वो ज़ुल्फ़ों को टुक इशारा आवें चले हज़ारों वहशी ग़ज़ाल बाँधे ईसा ओ ख़िज़्र तक भी पहुँचे अजल का मुज़्दा तू तेग़ अगर कमर पर बहर-ए-क़िताल बाँधे लाले की शाख़ हरगिज़ लहके न फिर चमन में गर सर पे सुर्ख़ चीरा वो नौनिहाल बाँधे लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से गो बादशाह डाँडे गो कोतवाल बाँधे हम किस तरह से देखें जब दे दे पेच लड़ के चीरे के पेचों में तो ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे बंदा हूँ मैं तो उस की आँखों की साहिरी का तार-ए-नज़र से जिस ने साहब-कमाल बाँधे हम एक बोसे के भी ममनूँ नहीं किसी के चाहे सो कोई तोहमत रोज़-ए-विसाल बाँधे सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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ख़्वाब था या ख़याल था क्या था हिज्र था या विसाल था क्या था मेरे पहलू में रात जा कर वो माह था या हिलाल था क्या था चमकी बिजली सी पर न समझे हम हुस्न था या जमाल था क्या था शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था वज्द था या वो हाल था क्या था जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे माह था या वो साल था क्या था 'मुसहफ़ी' शब जो चुप तू बैठा था क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

Mushafi Ghulam Hamdani

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अभी अपने मर्तबा-ए-हुस्न से मियाँ बा-ख़बर तू हुआ नहीं कि ग़ज़ल-सरा तिरे बाग़ में कोई मुर्ग़-ए-ताज़ा-नवा नहीं जो गली में यार की जाऊँ हूँ तो अजल कहे है ये रहम खा तू सितम-रसीदा न जा उधर कोई ज़िंदा वाँ से फिरा नहीं वो ग़रीब-ओ-बे-कस-ओ-ज़ार था तुझे उस का देता हूँ मैं पता तिरे कुश्ता का वो मज़ार था कि चराग़ जिस में जला नहीं जो हकीम पास मैं जाऊँ हूँ तो वो दोस्ती से सुनाए है तू मआश की भी तलाश कर ये मक़ाम-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ना नहीं मुझे इश्क़ रखता है सर-निगूँ मिरा जाल पूछो न क्या कहूँ मैं हबाब-ए-बहर का शीशा हूँ मिरे टूटने की सदा नहीं तिरे ख़ाकसारों ने अपना सर नहीं पीटा दश्त में इस क़दर कि बगूला वाँ से ग़ुबार का तरफ़ आसमाँ के गया नहीं न नसीम-ए-बाग़-ओ-बहार हूँ न फ़िदा-ए-रू-ए-निगार हूँ मैं ग़रीब-ए-शहर-ओ-दयार हूँ मिरी दैर ओ का'बा में जा नहीं तिरे नख़्ल-ए-हुस्न की कोंपलें अभी ना-शगुफ़्ता हैं ऐ परी जो नसीम आई है उस ने भी इन्हें कुछ समझ के छुआ नहीं तिरे गेसुओं में जो जाती है तो मिरा ही हाल कह आती है मिरी ख़स्म-ए-जाँ भी तो इस क़दर ये नसीम-ए-नाफ़ा-कुशा नहीं न मैं रहने वाला हूँ बाग़ का न सफ़ीर-संज हूँ राग का मुझे ढूँडे है सो वो किस जगह कहीं आशियान-ए-हुमा नहीं कोई ज़ख़्म-ख़ुर्दा है ख़ार का कोई ख़ूँ-तपीदा बहार का है मिरा ही हौसला 'मुसहफ़ी' कि किसी से मुझ को गिला नहीं

Mushafi Ghulam Hamdani

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