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ख़्वाब था या ख़याल था क्या था हिज्र था या विसाल था क्या था मेरे पहलू में रात जा कर वो माह था या हिलाल था क्या था चमकी बिजली सी पर न समझे हम हुस्न था या जमाल था क्या था शब जो दिल दो दो हाथ उछलता था वज्द था या वो हाल था क्या था जिस को हम रोज़-ए-हिज्र समझे थे माह था या वो साल था क्या था 'मुसहफ़ी' शब जो चुप तू बैठा था क्या तुझे कुछ मलाल था क्या था

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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अभी अपने मर्तबा-ए-हुस्न से मियाँ बा-ख़बर तू हुआ नहीं कि ग़ज़ल-सरा तिरे बाग़ में कोई मुर्ग़-ए-ताज़ा-नवा नहीं जो गली में यार की जाऊँ हूँ तो अजल कहे है ये रहम खा तू सितम-रसीदा न जा उधर कोई ज़िंदा वाँ से फिरा नहीं वो ग़रीब-ओ-बे-कस-ओ-ज़ार था तुझे उस का देता हूँ मैं पता तिरे कुश्ता का वो मज़ार था कि चराग़ जिस में जला नहीं जो हकीम पास मैं जाऊँ हूँ तो वो दोस्ती से सुनाए है तू मआश की भी तलाश कर ये मक़ाम-ए-फ़क़्र-ओ-फ़ना नहीं मुझे इश्क़ रखता है सर-निगूँ मिरा जाल पूछो न क्या कहूँ मैं हबाब-ए-बहर का शीशा हूँ मिरे टूटने की सदा नहीं तिरे ख़ाकसारों ने अपना सर नहीं पीटा दश्त में इस क़दर कि बगूला वाँ से ग़ुबार का तरफ़ आसमाँ के गया नहीं न नसीम-ए-बाग़-ओ-बहार हूँ न फ़िदा-ए-रू-ए-निगार हूँ मैं ग़रीब-ए-शहर-ओ-दयार हूँ मिरी दैर ओ का'बा में जा नहीं तिरे नख़्ल-ए-हुस्न की कोंपलें अभी ना-शगुफ़्ता हैं ऐ परी जो नसीम आई है उस ने भी इन्हें कुछ समझ के छुआ नहीं तिरे गेसुओं में जो जाती है तो मिरा ही हाल कह आती है मिरी ख़स्म-ए-जाँ भी तो इस क़दर ये नसीम-ए-नाफ़ा-कुशा नहीं न मैं रहने वाला हूँ बाग़ का न सफ़ीर-संज हूँ राग का मुझे ढूँडे है सो वो किस जगह कहीं आशियान-ए-हुमा नहीं कोई ज़ख़्म-ख़ुर्दा है ख़ार का कोई ख़ूँ-तपीदा बहार का है मिरा ही हौसला 'मुसहफ़ी' कि किसी से मुझ को गिला नहीं

Mushafi Ghulam Hamdani

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जमुना में कल नहा कर जब उस ने बाल बाँधे हम ने भी अपने दिल में क्या क्या ख़याल बाँधे ऐसा शिकोह उस की सूरत में है कि नागह आवे जो सामने से दस्त-ए-मजाल बाँधे आँखों से गर करे वो ज़ुल्फ़ों को टुक इशारा आवें चले हज़ारों वहशी ग़ज़ाल बाँधे ईसा ओ ख़िज़्र तक भी पहुँचे अजल का मुज़्दा तू तेग़ अगर कमर पर बहर-ए-क़िताल बाँधे लाले की शाख़ हरगिज़ लहके न फिर चमन में गर सर पे सुर्ख़ चीरा वो नौनिहाल बाँधे लत आशिक़ी की कोई जाए है आशिक़ों से गो बादशाह डाँडे गो कोतवाल बाँधे हम किस तरह से देखें जब दे दे पेच लड़ के चीरे के पेचों में तो ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे बंदा हूँ मैं तो उस की आँखों की साहिरी का तार-ए-नज़र से जिस ने साहब-कमाल बाँधे हम एक बोसे के भी ममनूँ नहीं किसी के चाहे सो कोई तोहमत रोज़-ए-विसाल बाँधे सोज़-ए-दिल अपना उस को क्या 'मुसहफ़ी' सुनावें आगो ही वो फिरे है कानों से शाल बाँधे

Mushafi Ghulam Hamdani

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