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अब के चेहरे पे वो दरार आई आईना बन गया तमाशाई अपना दिल जैसे दुखती आँख कोई उस की यादें कि जैसे पुरवाई एक मुद्दत के बा'द हम ने 'असद' उस को देखा तो अपनी याद आई

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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हर अँधेरा रौशनी में लग गया जिस को देखो शा'इरी में लग गया हम को मर जाने की फ़ुर्सत कब मिली वक़्त सारा ज़िन्दगी में लग गया अपना मैख़ाना बना सकते थे हम इतना पैसा मैकशी में लग गया ख़ुद से इतनी दूर जा निकले थे हम इक ज़माना वापसी में लग गया

Mehshar Afridi

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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आज जिन झीलों का बस काग़ज़ में नक़्शा रह गया एक मुद्दत तक मैं उन आँखों से बहता रह गया मैं उसे ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त समझा था मगर वो मेरे दिल में रहा और अच्छा ख़ासा रह गया वो जो आधे थे तुझे मिल कर मुक़म्मल हो गए जो मुक़म्मल था वो तेरे ग़म में आधा रह गया

Tehzeeb Hafi

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इस तरह से तर्जुमानी कर गया मेरे अश्कों को वो पानी कर गया उस ने चेहरे से हटा डाला नक़ाब और मेरी ग़ज़लें पुरानी कर गया रख गया वो अपने कपड़े सूखने धूप भी कितनी सुहानी कर गया भूल जाने की क़सम देना तेरा याद आने की निशानी कर गया दो घड़ी को पास आया था कोई दिल पे बरसों हुक्मरानी कर गया जिस पे मैं ईमान ले आया 'असद' मुझ से वो ही बे-ईमानी कर गया

Subhan Asad

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वो जो सूरत थी साथ साथ कभी सुर्ख़ महके गुलाब की सूरत उस की यादें उतरती रहती हैं ज़ेहन-ओ-दिल पे अज़ाब की सूरत ये रवय्या सही नहीं होता यूँँ हमें कश्मकश में मत डालो या हमें सच की तरह अपना लो या भुला भी दो ख़्वाब की सूरत उस ने अन-देखा अन-सुना कर के बे-तअल्लुक़ किया है तो अब हम उस की तस्वीर से निकालेंगे आँसुओं के हिसाब की सूरत अपनी झूटी अना की बातों में आ के उस को सुला तो बैठे हैं अब हैं सहराओं के मुसाफ़िर हम और वो सूरत सराब की सूरत

Subhan Asad

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रग-ए-जाँ में समा जाती हो जानाँ तुम इतना याद क्यूँँ आती हो जानाँ तुम्हारे साए है पहलू में अब तक कि जा कर भी कहाँ जाती हो जानाँ मिरी नींदें उड़ा रक्खी हैं तुम ने ये कैसे ख़्वाब दिखलाती हो जानाँ किसी दिन देखना मर जाऊँगा मैं मिरी क़स्में बहुत खाती हो जानाँ वो सुनता हूँ मैं अपनी धड़कनों से तुम आँखों से जो कह जाती हो जानाँ पराया-पन नहीं अपनाइयत है जो यूँँ आँखें चुरा जाती हो जानाँ

Subhan Asad

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दर्द के दाइमी रिश्तों से लिपट जाते हैं अक्स रोते हैं तो शीशों से लिपट जाते हैं हाए वो लोग जिन्हें हम ने भुला रक्खा है याद आते हैं तो साँसों से लिपट जाते हैं किस के पैरों के निशाँ हैं कि मुसाफ़िर भी अब मंज़िलें भूल के रस्तों से लिपट जाते हैं जब वो रोता है तो यक-लख़्त मिरी प्यास के होंट उस की आँखों के किनारों से लिपट जाते हैं जब उन्हें नींद पनाहें नहीं देती हैं 'असद' ख़्वाब फिर जागती आँखों से लिपट जाते हैं

Subhan Asad

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आज है कुछ सबब आज की शब न जा जान है ज़ेर-ए-लब आज की शब न जा क्या पता फिर तिरे वस्ल की साअ'तें हूँ कहाँ कैसे कब आज की शब न जा चाँद क्या फूल क्या शम्अ' क्या रंग क्या हैं परेशान सब आज की शब न जा वक़्त को कैसे तरतीब देते हैं लोग आ सिखा दे ये अब आज की शब न जा वो सहर भी तुझी से सहर थी 'असद' शब भी तुम से है शब आज की शब न जा

Subhan Asad

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