ghazalKuch Alfaaz

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए ऐ दिल की लगी चल यूँँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए अब क्यूँँ ढूँडूँ वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए इस जज़्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुम से लेता हूँ उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मिरा दिल आ जाए ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या मुझ को भी मूसा समझा है मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए कश्ती को ख़ुदा पर छोड़ भी दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है

Mehshar Afridi

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मोहब्बत मुस्तक़िल कैफ़-आफ़रीं मालूम होती है ख़लिश दिल में जहाँ पर थी वहीं मालूम होती है तिरे जल्वों से टकरा कर नहीं मालूम होती है नज़र भी एक मौज-ए-तह-नशीं मालूम होती है नुक़ूश-ए-पा के सदक़े बंदगी-इश्क़ के क़ुर्बां मुझे हर सम्त अपनी ही जबीं मालूम होती है मिरी रग रग में यूँँ तो दौड़ती है इश्क़ की बिजली कहीं ज़ाहिर नहीं होती कहीं मालूम होती है ये ए'जाज़-ए-नज़र कब है ये कब है हुस्न की काविश हसीं जो चीज़ होती है हसीं मालूम होती है उमीदें तोड़ दे मेरे दिल-ए-मुज़्तर ख़ुदा-हाफ़िज़ ज़बान-ए-हुस्न पर अब तक नहीं मालूम होती है उसे क्यूँँ मय-कदा कहता है बतला दे मिरे साक़ी यहाँ की सर-ज़मीं ख़ुल्द-ए-बरीं मालूम होती है अरे ऐ चारा-गर हाँ हाँ ख़लिश तू जिस को कहता है ये शय दिल में नहीं दिल के क़रीं मालूम होती है किसी के पा-ए-नाज़ुक पर झुकी है और नहीं उठती मुझे 'बहज़ाद' ये अपनी जबीं मालूम होती है

Behzad Lakhnavi

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है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे है वही अपना कि जो अपने से बेगाना रहे कुफ़्र से ये इल्तिजाएँ कर रहा हूँ बार बार जाऊँ तो का'बा मगर रुख़ सू-ए-मय-ख़ाना रहे शम-ए-सोज़ाँ कुछ ख़बर भी है तुझे ओ मस्त-ए-ग़म हुस्न-ए-महफ़िल है जभी जब तक कि परवाना रहे ज़ख़्म-ए-दिल ऐ ज़ख़्म-ए-दिल नासूर क्यूँँ बनता नहीं लुत्फ़ तो जब है कि अफ़्साने में अफ़्साना रहे हम को वाइज़ का भी दिल रखना है साक़ी का भी दिल हम तो तौबा कर के भी पाबंद-ए-मय-ख़ाना रहे आख़िरश कब तक रहेंगी हुस्न की नादानियाँ हुस्न से पूछो कि कब तक इश्क़ दीवाना रहे फ़ैज़-ए-राह-ए-इश्क़ है या फ़ैज़-ए-जज़्ब-ए-इश्क़ है हम तो मंज़िल पा के भी मंज़िल से बेगाना रहे मय-कदे में हम दुआएँ कर रहे हैं बार बार इस तरफ़ भी चश्म-ए-मस्त-ए-पीर-ए-मय-ख़ाना रहे आज तो साक़ी से ये 'बहज़ाद' ने बाँधा है अहद लब पे तौबा हो मगर हाथों में पैमाना रहे

Behzad Lakhnavi

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दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँँ अब तेरा कुफ़्र ही मिरा ईमाँ है क्या करूँँ बा-होश हूँ मगर मिरा दामन है चाक चाक आलम ये देख देख के हैराँ है क्या करूँँ हर तरह का सुकून है हर तरह का है कैफ़ फिर भी ये मेरा क़ल्ब परेशाँ है क्या करूँँ कहता नहीं हूँ और ज़माना है बा-ख़बर चेहरे से दिल का हाल नुमायाँ है क्या करूँँ दामन करूँँ न चाक ये मुमकिन तो है मगर मुज़्तर हर एक तार-ए-गरेबाँ है क्या करूँँ सादा सा इक वरक़ हूँ किताब-ए-हयात का हसरत से अब न अब कोई अरमाँ है क्या करूँँ हर सम्त पा रहा हूँ वही रंग-ए-दिल-फ़रेब हाथों में कुफ़्र के मिरा ईमाँ है क्या करूँँ दाग़ों का क़ल्ब-ए-ज़ार से मुमकिन तो है इलाज उन के ही दम से दिल में चराग़ाँ है क्या करूँँ इक बे-वफ़ा के वास्ते से सब कुछ लुटा दिया 'बहज़ाद' अब न दीन न ईमाँ है क्या करूँँ

Behzad Lakhnavi

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ख़ुदा को ढूँड रहा था कहीं ख़ुदा न मिला ज़हे-नसीब कि बंदे को मुद्दआ' न मिला निगाह-ए-शौक़ में बे-नूरियों का रंग बढ़ा निगाह-ए-शौक़ को जब कोई दूसरा न मिला हम अपनी बे-ख़ुदी-ए-शौक़ पर निसार रहे ख़ुदी को ढूँढ़ लिया जब हमें ख़ुदा न मिला तुम्हारी बज़्म में लब खोल कर हुआ ख़ामोश वो बद-नसीब जिसे कोई आसरा न मिला हर एक ज़र्रे में मैं ख़ुद तो आ रहा था नज़र अजीब बात तुम्हारा कहीं पता न मिला बस इक सुकून ही हम को न मिल सका ता-उम्र वगरना तेरे तसद्दुक़ में हम को क्या न मिला तिरी निगाह-ए-मोहब्बत-नवाज़ ही की क़सम कि आज तक तो हमें तुझ सा दूसरा न मिला तिरा जमाल फ़ज़ाओं में मुंतशिर था मगर निगाह-ए-शौक़ को फिर भी तिरा पता न मिला हज़ार ठोकरें खाईं हज़ार सू 'बहज़ाद' जहान-ए-हुस्न में कोई भी बा-वफ़ा न मिला

Behzad Lakhnavi

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इक बे-वफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया हम ने तो आह कुफ़्र को ईमाँ बना लिया दिल की ख़लिश-पसंदियाँ हैं कि अल्लाह की पनाह तीर-ए-नज़र को जान-ए-रग-ए-जाँ बना लिया मुझ को ख़बर नहीं मिरे दिल को ख़बर नहीं किस की नज़र ने बंदा-ए-एहसाँ बना लिया महसूस कर के हम ने मोहब्बत का हर अलम ख़्वाब-ए-सुबुक को ख़्वाब-ए-परेशाँ बना लिया दस्त-ए-जुनूँ की उक़्दा-कुशाई तो देखिए दामन को बे-नियाज़ गरेबाँ बना लिया तस्कीन-ए-दिल की हम ने भी परवाह छोड़ दी हर मौज-ए-ग़म को हासिल-ए-तूफ़ाँ बना लिया जब उन का नाम आ गया हम मुज़्तरिब हुए आहों को अपनी ज़ीस्त का उनवाँ बना लिया हम ने तो अपने दिल में वो ग़म हो कि हो अलम जो कोई आ गया उसे मेहमाँ बना लिया आईना देखने की ज़रूरत न थी कोई अपने को ख़ुद ही आप ने हैराँ बना लिया इक बे-वफ़ा पे कर के तसद्दुक़ दिल-ओ-जिगर 'बहज़ाद' हम ने ख़ुद को परेशाँ बना लिया

Behzad Lakhnavi

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