ghazalKuch Alfaaz

ऐश माज़ी के गिना हाल का ता'ना दे दे घर पलटने के लिए कोई बहाना दे दे मैं ने इस शहर को इक शख़्स का हमनाम किया चाहे अब जो भी इसे नाम ज़माना दे दे संग-ज़ादों को भी ता'मीर में शामिल कर लो इस से पहले कि कोई आइना-ख़ाना दे दे उस का रूमाल भी मजबूरी था हमदर्दी नहीं उस को ये डर था कोई और न शाना दे दे दिल के उजड़े हुए जंगल को पड़ा रहने दो ऐन मुमकिन है परिंदों को ठिकाना दे दे

Related Ghazal

मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

73 likes

वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

62 likes

बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है

Tehzeeb Hafi

182 likes

मुझ में कितने राज़ हैं बतलाऊँ क्या बंद एक मुद्दत से हूँ खुल जाऊँ क्या आजिज़ी मिन्नत ख़ुशामद इल्तिजा और मैं क्या क्या करूँँ मर जाऊँ क्या तेरे जलसे में तेरा परचम लिए सैकड़ों लाशें भी हैं गिनवाऊँ क्या कल यहाँ मैं था जहाँ तुम आज हो मैं तुम्हारी ही तरह इतराऊँ क्या एक पत्थर है वो मेरी राह का गर न ठुकराऊँ तो ठोकर खाऊँ क्या फिर जगाया तू ने सोए शे'र को फिर वही लहजा दराज़ी आऊँ क्या

Rahat Indori

56 likes

बग़ैर उस को बताए निभाना पड़ता है ये इश्क़ राज़ है इस को छुपाना पड़ता है मैं अपने ज़ेहन की ज़िदस बहुत परेशाँ हूँ तेरे ख़याल की चौखट पे आना पड़ता है तेरे बग़ैर ही अच्छे थे क्या मुसीबत है ये कैसा प्यार है हर दिन जताना पड़ता है

Mehshar Afridi

73 likes

More from Balmohan Pandey

समय से पहले भले शामे-ज़िंदगी आए, किसी तरह भी उदासी का घाव भर जाए जो शे'र समझे मुझे दाद वाद देता रहे, गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए हम उदास नहीं सर ब सर उदासी हैं, हमें चराग़ नहीं रौशनी कहा जाए किसी के हँसने से रौशन हुई थी बादे-सबा, कोई उदास हुआ तो गुलाब मुरझाए

Balmohan Pandey

8 likes

इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को अपने पहलू से कहीं दूर बिठा दे मुझ को मैं सुख़न-फ़हम किसी वस्ल का मुहताज नहीं चाँदनी रात है इक शे'र सुना दे मुझ को ख़ुद-कुशी करने के मौसम नहीं आते हर रोज़ ज़िंदगी अब कोई रस्ता न दिखा दे मुझ को एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को चारा-गर ठीक न होने की दवा दे मुझ को यूँँ तो सूरज हूँ मगर फ़िक्र लगी रहती है वो चराग़ों के भरम में न बुझा दे मुझ को तुझ को मा'लूम नहीं इश्क़ किसे कहते हैं अपने सीने पे नहीं दिल में जगह दे मुझ को हर नए शख़्स पे खुल जाने की आदत 'मोहन' देने वाले से कहो थोड़ी अना दे मुझ को

Balmohan Pandey

13 likes

दयार-ए-ग़म से हम बाहर निकल के शे'र कहते हैं मसाइल हैं बहुत से उन में ढल के शे'र कहते हैं दहकते आग के शो'लों पे चल के शे'र कहते हैं हमें पहचान लीजे हम ग़ज़ल के शे'र कहते हैं रिवायत के पुजारी इस लिए नाराज़ हैं हम से ख़ता ये है नए रस्तों पे चल के शे'र कहते हैं हमें तन्हाइयों का शोर जब बेचैन करता है इकट्ठी करते हैं यादें ग़ज़ल के शे'र कहते हैं सितारों की तरह रौशन हैं जिन के लफ़्ज़ ज़ेहनों में वो शायद मोम की सूरत पिघल के शे'र कहते हैं हमारी शाइ'री उस को कहीं रुस्वा न कर डाले सो उस के शहर में थोड़ा सँभल के शे'र कहते

Balmohan Pandey

6 likes

रवानगी में समय का ख़याल करते हैं फिर उस को भेज के पहरों मलाल करते हैं ज़रा से तल्ख़-बयानी पसंद हैं फिर भी उदास लोग मोहब्बत कमाल करते हैं अब उन को इश्क़ के आदाब कौन समझाए बुझे चराग़ हवा से सवाल करते हैं गुनह है इश्क़ पे पाबंदियाँ बजा लेकिन तुम्हारे लोग तो जीना मुहाल करते हैं इस एक जुमले ने करने नहीं दिया कुछ भी जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

Balmohan Pandey

13 likes

आग़ाज़ से अंजाम-ए-सफ़र देख रहा हूँ देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ तैराक लगातार यहाँ डूब रहे हैं चुप-चाप मैं दरिया का हुनर देख रहा हूँ इस ख़्वाब की ता'बीर कोई मुझ को बता दे मंज़िल से भी आगे का सफ़र देख रहा हूँ उस शख़्स के होंटों पे मिरा ज़िक्र बहुत है मैं अपनी दु'आओं का असर देख रहा हूँ जो तुझ को बहुत दूर कभी ले गई मुझ से मैं कब से वही राह-गुज़र देख रहा हूँ इक उम्र से क़ाएम है ये रातों की हुकूमत इक उम्र से मैं ख़्वाब-ए-सहर देख रहा हूँ

Balmohan Pandey

13 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Balmohan Pandey.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Balmohan Pandey's ghazal.