ghazalKuch Alfaaz

दयार-ए-ग़म से हम बाहर निकल के शे'र कहते हैं मसाइल हैं बहुत से उन में ढल के शे'र कहते हैं दहकते आग के शो'लों पे चल के शे'र कहते हैं हमें पहचान लीजे हम ग़ज़ल के शे'र कहते हैं रिवायत के पुजारी इस लिए नाराज़ हैं हम से ख़ता ये है नए रस्तों पे चल के शे'र कहते हैं हमें तन्हाइयों का शोर जब बेचैन करता है इकट्ठी करते हैं यादें ग़ज़ल के शे'र कहते हैं सितारों की तरह रौशन हैं जिन के लफ़्ज़ ज़ेहनों में वो शायद मोम की सूरत पिघल के शे'र कहते हैं हमारी शाइ'री उस को कहीं रुस्वा न कर डाले सो उस के शहर में थोड़ा सँभल के शे'र कहते

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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ऐश माज़ी के गिना हाल का ता'ना दे दे घर पलटने के लिए कोई बहाना दे दे मैं ने इस शहर को इक शख़्स का हमनाम किया चाहे अब जो भी इसे नाम ज़माना दे दे संग-ज़ादों को भी ता'मीर में शामिल कर लो इस से पहले कि कोई आइना-ख़ाना दे दे उस का रूमाल भी मजबूरी था हमदर्दी नहीं उस को ये डर था कोई और न शाना दे दे दिल के उजड़े हुए जंगल को पड़ा रहने दो ऐन मुमकिन है परिंदों को ठिकाना दे दे

Balmohan Pandey

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समय से पहले भले शामे-ज़िंदगी आए, किसी तरह भी उदासी का घाव भर जाए जो शे'र समझे मुझे दाद वाद देता रहे, गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए हम उदास नहीं सर ब सर उदासी हैं, हमें चराग़ नहीं रौशनी कहा जाए किसी के हँसने से रौशन हुई थी बादे-सबा, कोई उदास हुआ तो गुलाब मुरझाए

Balmohan Pandey

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रवानगी में समय का ख़याल करते हैं फिर उस को भेज के पहरों मलाल करते हैं ज़रा से तल्ख़-बयानी पसंद हैं फिर भी उदास लोग मोहब्बत कमाल करते हैं अब उन को इश्क़ के आदाब कौन समझाए बुझे चराग़ हवा से सवाल करते हैं गुनह है इश्क़ पे पाबंदियाँ बजा लेकिन तुम्हारे लोग तो जीना मुहाल करते हैं इस एक जुमले ने करने नहीं दिया कुछ भी जो लोग कुछ नहीं करते कमाल करते हैं

Balmohan Pandey

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इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को अपने पहलू से कहीं दूर बिठा दे मुझ को मैं सुख़न-फ़हम किसी वस्ल का मुहताज नहीं चाँदनी रात है इक शे'र सुना दे मुझ को ख़ुद-कुशी करने के मौसम नहीं आते हर रोज़ ज़िंदगी अब कोई रस्ता न दिखा दे मुझ को एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को चारा-गर ठीक न होने की दवा दे मुझ को यूँँ तो सूरज हूँ मगर फ़िक्र लगी रहती है वो चराग़ों के भरम में न बुझा दे मुझ को तुझ को मा'लूम नहीं इश्क़ किसे कहते हैं अपने सीने पे नहीं दिल में जगह दे मुझ को हर नए शख़्स पे खुल जाने की आदत 'मोहन' देने वाले से कहो थोड़ी अना दे मुझ को

Balmohan Pandey

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समय से पहले भले शाम-ए-ज़िंदगी आए किसी तरह भी उदासी का घाव भर जाए हम अब उदास नहीं सर-ब-सर उदासी हैं हमें चराग़ नहीं रौशनी कहा जाए जो शे'र समझे मुझे दाद-वाद देता रहे गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए गए दिनों में कोई शौक़ था मोहब्बत का अब इस अज़ाब में ये ज़ेहन कौन उलझाए किसी के हँसने से रौशन हुई थी बाद-ए-सबा कोई उदास हुआ तो गुलाब मुरझाए ये एक दुख ही दबा रह गया है आँखों में वो एक मिसरा जिसे शे'र कर नहीं पाए अगर हूँ ग़ुस्से में फिर भी मैं चाहता ये हूँ मैं सिर्फ़ हिज्र कहूँ और फ़ोन कट जाए

Balmohan Pandey

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