ghazalKuch Alfaaz

समय से पहले भले शाम-ए-ज़िंदगी आए किसी तरह भी उदासी का घाव भर जाए हम अब उदास नहीं सर-ब-सर उदासी हैं हमें चराग़ नहीं रौशनी कहा जाए जो शे'र समझे मुझे दाद-वाद देता रहे गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए गए दिनों में कोई शौक़ था मोहब्बत का अब इस अज़ाब में ये ज़ेहन कौन उलझाए किसी के हँसने से रौशन हुई थी बाद-ए-सबा कोई उदास हुआ तो गुलाब मुरझाए ये एक दुख ही दबा रह गया है आँखों में वो एक मिसरा जिसे शे'र कर नहीं पाए अगर हूँ ग़ुस्से में फिर भी मैं चाहता ये हूँ मैं सिर्फ़ हिज्र कहूँ और फ़ोन कट जाए

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा

Tehzeeb Hafi

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इस तरह से न आज़माओ मुझे उस की तस्वीर मत दिखाओ मुझे ऐन मुमकिन है मैं पलट आऊँ उस की आवाज़ में बुलाओ मुझे मैं ने बोला था याद मत आना झूठ बोला था याद आओ मुझे

Ali Zaryoun

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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ग़लत निकले सब अंदाज़े हमारे कि दिन आए नहीं अच्छे हमारे सफ़र से बाज़ रहने को कहा हैं किसी ने खोल के तस्में हमारे हर इक मौसम बहुत अंदर तक आया खुले रहते थे दरवाज़े हमारे उस अब्र-ए-मेहरबाँ से क्या शिकायत अगर बर्तन नहीं भरते हमारे

Tehzeeb Hafi

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समय से पहले भले शामे-ज़िंदगी आए, किसी तरह भी उदासी का घाव भर जाए जो शे'र समझे मुझे दाद वाद देता रहे, गले लगाए जिसे ग़म समझ में आ जाए हम उदास नहीं सर ब सर उदासी हैं, हमें चराग़ नहीं रौशनी कहा जाए किसी के हँसने से रौशन हुई थी बादे-सबा, कोई उदास हुआ तो गुलाब मुरझाए

Balmohan Pandey

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ऐश माज़ी के गिना हाल का ता'ना दे दे घर पलटने के लिए कोई बहाना दे दे मैं ने इस शहर को इक शख़्स का हमनाम किया चाहे अब जो भी इसे नाम ज़माना दे दे संग-ज़ादों को भी ता'मीर में शामिल कर लो इस से पहले कि कोई आइना-ख़ाना दे दे उस का रूमाल भी मजबूरी था हमदर्दी नहीं उस को ये डर था कोई और न शाना दे दे दिल के उजड़े हुए जंगल को पड़ा रहने दो ऐन मुमकिन है परिंदों को ठिकाना दे दे

Balmohan Pandey

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दयार-ए-ग़म से हम बाहर निकल के शे'र कहते हैं मसाइल हैं बहुत से उन में ढल के शे'र कहते हैं दहकते आग के शो'लों पे चल के शे'र कहते हैं हमें पहचान लीजे हम ग़ज़ल के शे'र कहते हैं रिवायत के पुजारी इस लिए नाराज़ हैं हम से ख़ता ये है नए रस्तों पे चल के शे'र कहते हैं हमें तन्हाइयों का शोर जब बेचैन करता है इकट्ठी करते हैं यादें ग़ज़ल के शे'र कहते हैं सितारों की तरह रौशन हैं जिन के लफ़्ज़ ज़ेहनों में वो शायद मोम की सूरत पिघल के शे'र कहते हैं हमारी शाइ'री उस को कहीं रुस्वा न कर डाले सो उस के शहर में थोड़ा सँभल के शे'र कहते

Balmohan Pandey

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इस से पहले कि कोई और हटा दे मुझ को अपने पहलू से कहीं दूर बिठा दे मुझ को मैं सुख़न-फ़हम किसी वस्ल का मुहताज नहीं चाँदनी रात है इक शे'र सुना दे मुझ को ख़ुद-कुशी करने के मौसम नहीं आते हर रोज़ ज़िंदगी अब कोई रस्ता न दिखा दे मुझ को एक ये ज़ख़्म ही काफ़ी है मिरे जीने को चारा-गर ठीक न होने की दवा दे मुझ को यूँँ तो सूरज हूँ मगर फ़िक्र लगी रहती है वो चराग़ों के भरम में न बुझा दे मुझ को तुझ को मा'लूम नहीं इश्क़ किसे कहते हैं अपने सीने पे नहीं दिल में जगह दे मुझ को हर नए शख़्स पे खुल जाने की आदत 'मोहन' देने वाले से कहो थोड़ी अना दे मुझ को

Balmohan Pandey

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सारी दुनिया की निगाहों से बचाकर रखना, अपनी आँखों में ही हर दर्द का ज़ेवर रखना उस को आदत ये परेशान बहुत रक्खेगी, उस की आदत थी मेरा हाथ पकड़ कर रखना इस का क्या शिकवा उसे रोक नहीं पाए हम, एक मुफ़लिस को कहाँ आता है ज़ेवर रखना हाए! वो इश्क़ छिपाने के ज़माने मोहन! याद आता है ग़लत नाम से नंबर रखना

Balmohan Pandey

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