अजब कश्मकश है अजब है कशाकश ये क्या बीच में है हमारे तुम्हारे ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत की ख़ातिर मरासिम हैं सारे हैं चारों तरफ़ ही बहुत लोग लेकिन हक़ीक़त में कोई भी अपना नहीं है दिखावा दिखावा सभी कुछ दिखावा दिखावे में जीते हैं सारे के सारे बुलंदी पे जिन को भी देखा ये पाया सभी आसरा ढूँडते फिर रहे हैं किसे सरपरस्ती के क़ाबिल समझिए जिए जा रहे हैं ख़ुद अपने सहारे सभी अपनी अपनी कहे जा रहे हैं हमें हम से छीने लिए जा रहे हैं हमें अपनी ख़ातिर भी रहने दो थोड़ा नहीं कोई अपना सिवा अब हमारे हमें अपनी ज़द में ही रहना पड़ेगा ख़ुदी को ख़ुदी में डुबोना पड़ेगा न आपे से बाहर तू आना समुंदर समुंदर को समझा रहे हैं किनारे फ़क़त दूरियों में ही सारी कशिश है कि नज़दीकियों से भरम टूटते हैं फ़लक पे चमकना है क़िस्मत हमारी ज़मीं से ये कहते हैं टूटे सितारे ये झूटे से रिश्ते ये फ़र्ज़ी से नाते कहाँ तक निभाएँ कहाँ तक निभाएँ बहुत हो चुका बस बहुत हो चुका अब कोई तो बढ़े ये मखोटे उतारे
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
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बे-हद बेचैनी है लेकिन मक़्सद ज़ाहिर कुछ भी नहीं पाना खोना हँसना रोना क्या है आख़िर कुछ भी नहीं अपनी अपनी क़िस्मत सब की अपना अपना हिस्सा है जिस्म की ख़ातिर लाखों सामाँ रूह की ख़ातिर कुछ भी नहीं उस की बाज़ी उस के मोहरे उस की चालें उस की जीत उस के आगे सारे क़ादिर माहिर शातिर कुछ भी नहीं उस का होना या ना होना ख़ुद में उजागर होता है गर वो है तो भीतर ही है वर्ना ब-ज़ाहिर कुछ भी नहीं दुनिया से जो पाया उस ने दुनिया ही को सौंप दिया ग़ज़लें नज़्में दुनिया की हैं क्या है शाइ'र कुछ भी नहीं
Deepti Mishra
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सब कुछ झूट है लेकिन फिर भी बिल्कुल सच्चा लगता है जान-बूझ कर धोका खाना कितना अच्छा लगता है ईंट और पत्थर मिट्टी गारे के मज़बूत मकानों में पक्की दीवारों के पीछे हर घर कच्चा लगता है आप बनाता है पहले फिर अपने आप मिटाता है दुनिया का ख़ालिक़ हम को इक ज़िद्दी बच्चा लगता है इस ने सारी क़स्में तोड़ें सारे वा'दे झूटे थे फिर भी हम को उस का होना अब भी अच्छा लगता है उसे यक़ीं है बे-ईमानी बिन वो बाज़ी जीतेगा अच्छा इंसाँ है पर अभी खिलाड़ी कच्चा लगता है
Deepti Mishra
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है
Deepti Mishra
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