बे-हद बेचैनी है लेकिन मक़्सद ज़ाहिर कुछ भी नहीं पाना खोना हँसना रोना क्या है आख़िर कुछ भी नहीं अपनी अपनी क़िस्मत सब की अपना अपना हिस्सा है जिस्म की ख़ातिर लाखों सामाँ रूह की ख़ातिर कुछ भी नहीं उस की बाज़ी उस के मोहरे उस की चालें उस की जीत उस के आगे सारे क़ादिर माहिर शातिर कुछ भी नहीं उस का होना या ना होना ख़ुद में उजागर होता है गर वो है तो भीतर ही है वर्ना ब-ज़ाहिर कुछ भी नहीं दुनिया से जो पाया उस ने दुनिया ही को सौंप दिया ग़ज़लें नज़्में दुनिया की हैं क्या है शाइ'र कुछ भी नहीं
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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
Tehzeeb Hafi
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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सब कुछ झूट है लेकिन फिर भी बिल्कुल सच्चा लगता है जान-बूझ कर धोका खाना कितना अच्छा लगता है ईंट और पत्थर मिट्टी गारे के मज़बूत मकानों में पक्की दीवारों के पीछे हर घर कच्चा लगता है आप बनाता है पहले फिर अपने आप मिटाता है दुनिया का ख़ालिक़ हम को इक ज़िद्दी बच्चा लगता है इस ने सारी क़स्में तोड़ें सारे वा'दे झूटे थे फिर भी हम को उस का होना अब भी अच्छा लगता है उसे यक़ीं है बे-ईमानी बिन वो बाज़ी जीतेगा अच्छा इंसाँ है पर अभी खिलाड़ी कच्चा लगता है
Deepti Mishra
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अजब कश्मकश है अजब है कशाकश ये क्या बीच में है हमारे तुम्हारे ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत की ख़ातिर मरासिम हैं सारे हैं चारों तरफ़ ही बहुत लोग लेकिन हक़ीक़त में कोई भी अपना नहीं है दिखावा दिखावा सभी कुछ दिखावा दिखावे में जीते हैं सारे के सारे बुलंदी पे जिन को भी देखा ये पाया सभी आसरा ढूँडते फिर रहे हैं किसे सरपरस्ती के क़ाबिल समझिए जिए जा रहे हैं ख़ुद अपने सहारे सभी अपनी अपनी कहे जा रहे हैं हमें हम से छीने लिए जा रहे हैं हमें अपनी ख़ातिर भी रहने दो थोड़ा नहीं कोई अपना सिवा अब हमारे हमें अपनी ज़द में ही रहना पड़ेगा ख़ुदी को ख़ुदी में डुबोना पड़ेगा न आपे से बाहर तू आना समुंदर समुंदर को समझा रहे हैं किनारे फ़क़त दूरियों में ही सारी कशिश है कि नज़दीकियों से भरम टूटते हैं फ़लक पे चमकना है क़िस्मत हमारी ज़मीं से ये कहते हैं टूटे सितारे ये झूटे से रिश्ते ये फ़र्ज़ी से नाते कहाँ तक निभाएँ कहाँ तक निभाएँ बहुत हो चुका बस बहुत हो चुका अब कोई तो बढ़े ये मखोटे उतारे
Deepti Mishra
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वो नहीं मेरा मगर उस से मोहब्बत है तो है ये अगर रस्मों रिवाजों से बग़ावत है तो है सच को मैं ने सच कहा जब कह दिया तो कह दिया अब ज़माने की नज़र में ये हिमाक़त है तो है कब कहा मैं ने कि वो मिल जाए मुझ को मैं उसे ग़ैर न हो जाए वो बस इतनी हसरत है तो है जल गया परवाना गर तो क्या ख़ता है शम्अ'' की रात भर जलना जलाना उस की क़िस्मत है तो है दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फ़ितरत है तो है दूर थे और दूर हैं हर दम ज़मीन-ओ-आसमाँ दूरियों के बा'द भी दोनों में क़ुर्बत है तो है
Deepti Mishra
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