ghazalKuch Alfaaz

अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जिला भी न सकूँ मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे उस ने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ इक न इक रोज़ कहीं ढूँड ही लूँगा तुझ को ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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यूँँ सदा देते हुए तेरे ख़याल आते हैं जैसे का'बे की खुली छत पे बिलाल आते हैं रोज़ हम अश्कों से धो आते हैं दीवार-ए-हरम पगड़ियाँ रोज़ फ़रिश्तों की उछाल आते हैं हाथ अभी पीछे बंधे रहते हैं चुप रहते हैं देखना ये है तुझे कितने कमाल आते हैं चाँद सूरज मिरी चौखट पे कई सदियों से रोज़ लिक्खे हुए चेहरे पे सवाल आते हैं बे-हिसी मुर्दा-दिली रक़्स शराबें नग़्में बस इसी राह से क़ौमों पे ज़वाल आते हैं

Rahat Indori

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इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

Rahat Indori

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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था

Rahat Indori

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ये ख़ाक-ज़ादे जो रहते हैं बे-ज़बान पड़े इशारा कर दें तो सूरज ज़मीं पे आन पड़े सुकूत-ए-ज़ीस्त को आमादा-ए-बग़ावत कर लहू उछाल कि कुछ ज़िंदगी में जान पड़े हमारे शहर की बीनाइयों पे रोते हैं तमाम शहर के मंज़र लहू-लुहान पड़े उठे हैं हाथ मिरे हुर्मत-ए-ज़मीं के लिए मज़ा जब आए कि अब पाँव आसमान पड़े किसी मकीन की आमद के इंतिज़ार में हैं मिरे मोहल्ले में ख़ाली कई मकान पड़े

Rahat Indori

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