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apne sab yaar kaam kar rahe hain aur ham hain ki naam kar rahe hain teghh-bazi ka shauq apni jagah aap to qatl-e-am kar rahe hain dad-o-tahsin ka ye shor hai kyuun ham to khud se kalam kar rahe hain ham hain masruf-e-intizam magar jaane kya intizam kar rahe hain hai vo bechargi ka haal ki ham har kisi ko salam kar rahe hain ek qattala chahiye ham ko ham ye ealan-e-am kar rahe hain kya bhala saghhar-e-sifal ki ham naf-pyale ko jaam kar rahe hain ham to aae the arz-e-matlab ko aur vo ehtiram kar rahe hain na uthe aah ka dhuan bhi ki vo ku-e-dil men khiram kar rahe hain us ke honton pe rakh ke hont apne baat hi ham tamam kar rahe hain ham ajab hain ki us ke kuche men be-sabab dhum-dham kar rahe hain apne sab yar kaam kar rahe hain aur hum hain ki nam kar rahe hain tegh-bazi ka shauq apni jagah aap to qatl-e-am kar rahe hain dad-o-tahsin ka ye shor hai kyun hum to khud se kalam kar rahe hain hum hain masruf-e-intizam magar jaane kya intizam kar rahe hain hai wo bechaargi ka haal ki hum har kisi ko salam kar rahe hain ek qattala chahiye hum ko hum ye ealan-e-am kar rahe hain kya bhala saghar-e-sifal ki hum naf-pyale ko jam kar rahe hain hum to aae the arz-e-matlab ko aur wo ehtiram kar rahe hain na uthe aah ka dhuan bhi ki wo ku-e-dil mein khiram kar rahe hain us ke honton pe rakh ke hont apne baat hi hum tamam kar rahe hain hum ajab hain ki us ke kuche mein be-sabab dhum-dham kar rahe hain

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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