अपनी ख़ुद्दारी तो पामाल नहीं कर सकते उस का नंबर है मगर काल नहीं कर सकते सीम जाएगा तो फिर नक़्श उभारेंगे कोई काम दीवार पे फ़िलहाल नहीं कर सकते रह भी सकता है तिरा नाम कहीं लिक्खा हुआ सारे जंगल की तो पड़ताल नहीं कर सकते दोस्त तस्वीर बहुत दूर से खींची गई है हम उजागर ये ख़द-ओ-ख़ाल नहीं कर सकते रोती आँखों पे मियाँ हाथ तो रख सकते हैं पेश अगर आप को रूमाल नहीं कर सकते दे न दे काम की उजरत ये है मर्ज़ी उस की पेशा-ए-इश्क़ में हड़ताल नहीं कर सकते दश्त आए जिसे वहशत की तलब हो 'नादिर' ये ग़िज़ा शहर हम इर्साल नहीं कर सकते
Related Ghazal
पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
96 likes
चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
105 likes
तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
81 likes
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं
Dagh Dehlvi
84 likes
More from Nadir Ariz
धुँधला गया हूँ दूर के मंज़र में जा के मैं पछता रहा हूँ शह्र से क़स्बे में आ के मैं अब उस कली पे सिर्फ़ मिरा हक़ है दोस्तो लौटा हूँ हाथ पेड़ को पहले लगा के मैं शो'ला दिए को ज़िन्दगी देते ही बुझ गया मंज़र से हट गया उसे मंज़र पे ला के मैं साहब यक़ीन कीजिए चोरी की ख़ू नहीं बाग़ आ गया हूँ दोस्त की बातों में आ के मैं उस दर के बंद होने का बदला लिया है दोस्त जो बेचता रहा हूँ दरीचे बना के मैं
Nadir Ariz
1 likes
कैसे ईमान नहीं लाएँगे हम तेरे सर की क़सम खाएंगे फूल फेकेंगे बस आने पे मेरे अपने बाज़ू नहीं फैलाएँगे इतने बरसो की जुदाई है कि अब उस को देखेंगे तो मर जाएँगे
Nadir Ariz
3 likes
मैं उसे चाहने वालों में घिरा छोड़ गया या'नी उस पेड़ को उतना ही घना छोड़ गया चीज़ें गिरती गईं रस्ते में फटे थैले से चोर ग़फ़लत में ठिकाने का पता छोड़ गया वापस आने को तसल्ली दी, न सीने से लगा कोई जाते हुए दरवाज़ा खुला छोड़ गया सिर्फ़ आते हुए क़दमों के निशाँ मिलते हैं ख़ुद कहाँ है जो किनारे पे घड़ा छोड़ गया साथ रक्खा न पलटने दिया घर की जानिब कोई कश्ती को जज़ीरे से लगा छोड़ गया
Nadir Ariz
1 likes
पेड़ पौधे हैं तितलियाँ नहीं हैं कैसा क़स्बा है लड़कियाँ नहीं हैं देख कर पाँव रखना पड़ता है इन पहाड़ों पे सीढ़ियाँ नहीं हैं मेरे अँगूठे से खुलेगा ये लॉक इस तिजोरी की चाबियाँ नहीं हैं नाव का वरना मसअला नहीं था इस जज़ीरे पे लकड़ियाँ नहीं हैं बद्दुआ लग गई है किस की उसे उस कलाई में चूड़ियाँ नहीं हैं बारिश आई तो भीग जाएँगे पेड़ों के पास छतरियाँ नहीं हैं
Nadir Ariz
3 likes
बोले तो अच्छा बुरा महसूस हो उस की ख़ामोशी से क्या महसूस हो इस तरह दीवार पर तस्वीर रख आदमी बैठा हुआ महसूस हो दाम मुँह माँगे मिलेंगे और नक़्द क़त्ल लेकिन हादसा महसूस हो रख लिया अख़बार पैसों की जगह ताकि बटुआ कुछ भरा महसूस हो देखना चाहूँ उसे तो हर कोई मेरी जानिब' देखता महसूस हो पास जाने पर खुले प्यासे पे रेत दूर से पानी खड़ा महसूस हो
Nadir Ariz
3 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Nadir Ariz.
Similar Moods
More moods that pair well with Nadir Ariz's ghazal.







