पेड़ पौधे हैं तितलियाँ नहीं हैं कैसा क़स्बा है लड़कियाँ नहीं हैं देख कर पाँव रखना पड़ता है इन पहाड़ों पे सीढ़ियाँ नहीं हैं मेरे अँगूठे से खुलेगा ये लॉक इस तिजोरी की चाबियाँ नहीं हैं नाव का वरना मसअला नहीं था इस जज़ीरे पे लकड़ियाँ नहीं हैं बद्दुआ लग गई है किस की उसे उस कलाई में चूड़ियाँ नहीं हैं बारिश आई तो भीग जाएँगे पेड़ों के पास छतरियाँ नहीं हैं
Related Ghazal
चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
105 likes
चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
103 likes
पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं
Ali Zaryoun
158 likes
बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
196 likes
सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
140 likes
More from Nadir Ariz
कैसे ईमान नहीं लाएँगे हम तेरे सर की क़सम खाएंगे फूल फेकेंगे बस आने पे मेरे अपने बाज़ू नहीं फैलाएँगे इतने बरसो की जुदाई है कि अब उस को देखेंगे तो मर जाएँगे
Nadir Ariz
3 likes
बोले तो अच्छा बुरा महसूस हो उस की ख़ामोशी से क्या महसूस हो इस तरह दीवार पर तस्वीर रख आदमी बैठा हुआ महसूस हो दाम मुँह माँगे मिलेंगे और नक़्द क़त्ल लेकिन हादसा महसूस हो रख लिया अख़बार पैसों की जगह ताकि बटुआ कुछ भरा महसूस हो देखना चाहूँ उसे तो हर कोई मेरी जानिब' देखता महसूस हो पास जाने पर खुले प्यासे पे रेत दूर से पानी खड़ा महसूस हो
Nadir Ariz
3 likes
धुँधला गया हूँ दूर के मंज़र में जा के मैं पछता रहा हूँ शह्र से क़स्बे में आ के मैं अब उस कली पे सिर्फ़ मिरा हक़ है दोस्तो लौटा हूँ हाथ पेड़ को पहले लगा के मैं शो'ला दिए को ज़िन्दगी देते ही बुझ गया मंज़र से हट गया उसे मंज़र पे ला के मैं साहब यक़ीन कीजिए चोरी की ख़ू नहीं बाग़ आ गया हूँ दोस्त की बातों में आ के मैं उस दर के बंद होने का बदला लिया है दोस्त जो बेचता रहा हूँ दरीचे बना के मैं
Nadir Ariz
1 likes
अपनी ख़ुद्दारी तो पामाल नहीं कर सकते उस का नंबर है मगर काल नहीं कर सकते सीम जाएगा तो फिर नक़्श उभारेंगे कोई काम दीवार पे फ़िलहाल नहीं कर सकते रह भी सकता है तिरा नाम कहीं लिक्खा हुआ सारे जंगल की तो पड़ताल नहीं कर सकते दोस्त तस्वीर बहुत दूर से खींची गई है हम उजागर ये ख़द-ओ-ख़ाल नहीं कर सकते रोती आँखों पे मियाँ हाथ तो रख सकते हैं पेश अगर आप को रूमाल नहीं कर सकते दे न दे काम की उजरत ये है मर्ज़ी उस की पेशा-ए-इश्क़ में हड़ताल नहीं कर सकते दश्त आए जिसे वहशत की तलब हो 'नादिर' ये ग़िज़ा शहर हम इर्साल नहीं कर सकते
Nadir Ariz
0 likes
मैं उसे चाहने वालों में घिरा छोड़ गया या'नी उस पेड़ को उतना ही घना छोड़ गया चीज़ें गिरती गईं रस्ते में फटे थैले से चोर ग़फ़लत में ठिकाने का पता छोड़ गया वापस आने को तसल्ली दी, न सीने से लगा कोई जाते हुए दरवाज़ा खुला छोड़ गया सिर्फ़ आते हुए क़दमों के निशाँ मिलते हैं ख़ुद कहाँ है जो किनारे पे घड़ा छोड़ गया साथ रक्खा न पलटने दिया घर की जानिब कोई कश्ती को जज़ीरे से लगा छोड़ गया
Nadir Ariz
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Nadir Ariz.
Similar Moods
More moods that pair well with Nadir Ariz's ghazal.







