ghazalKuch Alfaaz

बोले तो अच्छा बुरा महसूस हो उस की ख़ामोशी से क्या महसूस हो इस तरह दीवार पर तस्वीर रख आदमी बैठा हुआ महसूस हो दाम मुँह माँगे मिलेंगे और नक़्द क़त्ल लेकिन हादसा महसूस हो रख लिया अख़बार पैसों की जगह ताकि बटुआ कुछ भरा महसूस हो देखना चाहूँ उसे तो हर कोई मेरी जानिब' देखता महसूस हो पास जाने पर खुले प्यासे पे रेत दूर से पानी खड़ा महसूस हो

Nadir Ariz3 Likes

Related Ghazal

कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

70 likes

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

More from Nadir Ariz

कैसे ईमान नहीं लाएँगे हम तेरे सर की क़सम खाएंगे फूल फेकेंगे बस आने पे मेरे अपने बाज़ू नहीं फैलाएँगे इतने बरसो की जुदाई है कि अब उस को देखेंगे तो मर जाएँगे

Nadir Ariz

3 likes

धुँधला गया हूँ दूर के मंज़र में जा के मैं पछता रहा हूँ शह्‌र से क़स्बे में आ के मैं अब उस कली पे सिर्फ़ मिरा हक़ है दोस्तो लौटा हूँ हाथ पेड़ को पहले लगा के मैं शो'ला दिए को ज़िन्दगी देते ही बुझ गया मंज़र से हट गया उसे मंज़र पे ला के मैं साहब यक़ीन कीजिए चोरी की ख़ू नहीं बाग़ आ गया हूँ दोस्त की बातों में आ के मैं उस दर के बंद होने का बदला लिया है दोस्त जो बेचता रहा हूँ दरीचे बना के मैं

Nadir Ariz

1 likes

पेड़ पौधे हैं तितलियाँ नहीं हैं कैसा क़स्बा है लड़कियाँ नहीं हैं देख कर पाँव रखना पड़ता है इन पहाड़ों पे सीढ़ियाँ नहीं हैं मेरे अँगूठे से खुलेगा ये लॉक इस तिजोरी की चाबियाँ नहीं हैं नाव का वरना मसअला नहीं था इस जज़ीरे पे लकड़ियाँ नहीं हैं बद्‌दुआ लग गई है किस की उसे उस कलाई में चूड़ियाँ नहीं हैं बारिश आई तो भीग जाएँगे पेड़ों के पास छतरियाँ नहीं हैं

Nadir Ariz

3 likes

मैं उसे चाहने वालों में घिरा छोड़ गया या'नी उस पेड़ को उतना ही घना छोड़ गया चीज़ें गिरती गईं रस्ते में फटे थैले से चोर ग़फ़लत में ठिकाने का पता छोड़ गया वापस आने को तसल्ली दी, न सीने से लगा कोई जाते हुए दरवाज़ा खुला छोड़ गया सिर्फ़ आते हुए क़दमों के निशाँ मिलते हैं ख़ुद कहाँ है जो किनारे पे घड़ा छोड़ गया साथ रक्खा न पलटने दिया घर की जानिब कोई कश्ती को जज़ीरे से लगा छोड़ गया

Nadir Ariz

1 likes

अपनी ख़ुद्दारी तो पामाल नहीं कर सकते उस का नंबर है मगर काल नहीं कर सकते सीम जाएगा तो फिर नक़्श उभारेंगे कोई काम दीवार पे फ़िलहाल नहीं कर सकते रह भी सकता है तिरा नाम कहीं लिक्खा हुआ सारे जंगल की तो पड़ताल नहीं कर सकते दोस्त तस्वीर बहुत दूर से खींची गई है हम उजागर ये ख़द-ओ-ख़ाल नहीं कर सकते रोती आँखों पे मियाँ हाथ तो रख सकते हैं पेश अगर आप को रूमाल नहीं कर सकते दे न दे काम की उजरत ये है मर्ज़ी उस की पेशा-ए-इश्क़ में हड़ताल नहीं कर सकते दश्त आए जिसे वहशत की तलब हो 'नादिर' ये ग़िज़ा शहर हम इर्साल नहीं कर सकते

Nadir Ariz

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Nadir Ariz.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Nadir Ariz's ghazal.