अर्ज़-ए-मुद्दआ करते क्यूँँ नहीं किया हम ने ख़्वाहिशों को हसरत में ख़ुद बदल दिया हम ने नित नई उमीदों के टाँक टाँक कर पैवंद ज़िंदगी के दामन को उम्र-भर सिया हम ने रंज-ओ-ग़म उठाए हैं फ़िक्र-ओ-फ़न भी पाए हैं ज़िंदगी को जितना भी जी सके जिया हम ने सुब्ह का नया सूरज कुछ तो रौशनी लेगा शाम से जलाया है आस का दिया हम ने दाग़-ए-दिल की ज़रदारी मुफ़्त हाथ कब आई ख़ाक हो के पाया है राज़-ए-कीमिया हम ने
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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है नूर-ए-ख़ुदा भी यहाँ इरफ़ान-ए-ख़ुदा भी ये ज़ात कि है वादी-ए-सीना भी हिरा भी उस बन में किया करती है तप मेरी अना भी इस शहर में है कार-गह-ए-अर्ज़-ओ-समा भी करता हूँ तवाफ़ अपना तो मिलती है नई राह क़िबला भी है ये ज़ात मिरा क़िबला-नुमा भी ख़ुद-आगही ओ ख़ुद-निगही का है ये इनआ'म और जुर्म-ए-शनासाई-ए-आलम की सज़ा भी होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा सर-ए-एहसास जो देखती रहती है मिरी आँख दिखा भी करती है कमर-बस्ता सफ़र पर भी यही ज़ात जब दूर निकल जाता हूँ देती है सदा भी ज़र्रे में है कौनैन तो कौनैन में ज़र्रा कुछ है तुझे आवारा-ए-अफ़्लाक पता भी
Ameeq Hanafi
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मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है ये है विसाल की रस्म अनोखी ये मिलने की रीत नई है वो जब मुझ को देख रही थी मैं ने उस को देख लिया था बस इतनी सी बात थी लेकिन बढ़ते बढ़ते कितने बढ़ी है बे-सूरत बे-जिस्म आवाज़ें अंदर भेज रही हैं हवाएँ बंद हैं कमरे के दरवाज़े लेकिन खिड़की खुली हुई है मेरे घर की छत के ऊपर सूरज आया चाँद भी उतरा छत के नीचे के कमरों की जैसी थी औक़ात वही है
Ameeq Hanafi
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ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को
Ameeq Hanafi
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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा दश्त मेरा न ये चमन मेरा मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है छू गया था उसे दहन मेरा मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ क्या बिगाड़ेगी अंजुमन मेरा हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा
Ameeq Hanafi
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