ghazalKuch Alfaaz

है नूर-ए-ख़ुदा भी यहाँ इरफ़ान-ए-ख़ुदा भी ये ज़ात कि है वादी-ए-सीना भी हिरा भी उस बन में किया करती है तप मेरी अना भी इस शहर में है कार-गह-ए-अर्ज़-ओ-समा भी करता हूँ तवाफ़ अपना तो मिलती है नई राह क़िबला भी है ये ज़ात मिरा क़िबला-नुमा भी ख़ुद-आगही ओ ख़ुद-निगही का है ये इनआ'म और जुर्म-ए-शनासाई-ए-आलम की सज़ा भी होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा सर-ए-एहसास जो देखती रहती है मिरी आँख दिखा भी करती है कमर-बस्ता सफ़र पर भी यही ज़ात जब दूर निकल जाता हूँ देती है सदा भी ज़र्रे में है कौनैन तो कौनैन में ज़र्रा कुछ है तुझे आवारा-ए-अफ़्लाक पता भी

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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना

Zubair Ali Tabish

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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

Nida Fazli

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तुम्हारा क्या है तुम्हें सिर्फ़ ज्ञान देना है हमारी सोचो हमें इम्तिहान देना है गुलाब भी हैं गुलाबों में ख़ार भी हैं बता निशानी देनी है या फिर निशान देना है तेरा सवाल मेरी जान का सवाल है और जवाब देने से आसान जान देना है उन्होंने अपने मुताबिक़ सज़ा सुना दी है हमें सज़ा के मुताबिक़ बयान देना है ये बेज़ुबानों की महफ़िल है दोस्त याद रहे यहाँ ख़मोशी का मतलब ज़बान देना है

Charagh Sharma

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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अर्ज़-ए-मुद्दआ करते क्यूँँ नहीं किया हम ने ख़्वाहिशों को हसरत में ख़ुद बदल दिया हम ने नित नई उमीदों के टाँक टाँक कर पैवंद ज़िंदगी के दामन को उम्र-भर सिया हम ने रंज-ओ-ग़म उठाए हैं फ़िक्र-ओ-फ़न भी पाए हैं ज़िंदगी को जितना भी जी सके जिया हम ने सुब्ह का नया सूरज कुछ तो रौशनी लेगा शाम से जलाया है आस का दिया हम ने दाग़-ए-दिल की ज़रदारी मुफ़्त हाथ कब आई ख़ाक हो के पाया है राज़-ए-कीमिया हम ने

Ameeq Hanafi

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मैं भी कब से चुप बैठा हूँ वो भी कब से चुप बैठी है ये है विसाल की रस्म अनोखी ये मिलने की रीत नई है वो जब मुझ को देख रही थी मैं ने उस को देख लिया था बस इतनी सी बात थी लेकिन बढ़ते बढ़ते कितने बढ़ी है बे-सूरत बे-जिस्म आवाज़ें अंदर भेज रही हैं हवाएँ बंद हैं कमरे के दरवाज़े लेकिन खिड़की खुली हुई है मेरे घर की छत के ऊपर सूरज आया चाँद भी उतरा छत के नीचे के कमरों की जैसी थी औक़ात वही है

Ameeq Hanafi

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ग़ुबार-ओ-गर्द ने समझा है रहनुमा मुझ को तलाश करता फिरा है ये क़ाफ़िला मुझ को तवील राह-ए-सफ़र पर हैं फूट फूट पड़ा न क्यूँँ समझते मिरे पैर आबला मुझ को शिकस्त-ए-दिल की सदा हूँ बिखर भी जाने दे ख़ुतूत-ओ-रंग की ज़ंजीर मत पिन्हा मुझ को ज़मीन पर है समुंदर फ़लक पे अब्र-ए-ग़ुबार उतारती है कहाँ देखिए हवा मुझ को सुकूत तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का इक गराँ लम्हा बना गया है सदाओं का सिलसिला मुझ को वो दूर दूर से अब क्यूँँ मुझे जलाता है क़रीब आ के बहुत जो बुझा गया मुझ को रचा के एक तिलिस्म-ए-सवाबित-ओ-सय्यार कशिश में अपनी बुलाने लगा ख़ला मुझ को

Ameeq Hanafi

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मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा दश्त मेरा न ये चमन मेरा मैं कि हर चंद एक ख़ाना-नशीं अंजुमन अंजुमन सुख़न मेरा बर्ग-ए-गुल पर चराग़ सा क्या है छू गया था उसे दहन मेरा मैं कि टूटा हुआ सितारा हूँ क्या बिगाड़ेगी अंजुमन मेरा हर घड़ी इक नया तक़ाज़ा है दर्द-ए-सर बन गया बदन मेरा

Ameeq Hanafi

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