ghazalKuch Alfaaz

बात कुछ हम से बन न आई आज बोल कर हम ने मुँह की खाई आज चुप पर अपनी भरम थे क्या क्या कुछ बात बिगड़ी बनी बनाई आज शिकवा करने की ख़ू न थी अपनी पर तबीअत ही कुछ भर आई आज बज़्म साक़ी ने दी उलट सारी ख़ूब भर भर के ख़ुम लुंढाई आज मासियत पर है देर से या रब नफ़्स और शरा में लड़ाई आज ग़ालिब आता है नफ़्स-ए-दूँ या शरअ' देखनी है तिरी ख़ुदाई आज चोर है दिल में कुछ न कुछ यारो नींद फिर रात भर न आई आज ज़द से उल्फ़त की बच के चलना था मुफ़्त 'हाली' ने चोट खाई आज

Related Ghazal

मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

456 likes

चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

406 likes

क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

371 likes

ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

355 likes

तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

235 likes

More from Altaf Hussain Hali

ख़ूबियाँ अपने में गो बे-इंतिहा पाते हैं हम पर हर इक ख़ूबी में दाग़ इक ऐब का पाते हैं हम ख़ौफ़ का कोई निशाँ ज़ाहिर नहीं अफ़आ'ल में गो कि दिल में मुत्तसिल ख़ौफ़-ए-ख़ुदा पाते हैं हम करते हैं ताअ'त तो कुछ ख़्वाहाँ नुमाइश के नहीं पर गुनह छुप छुप के करने में मज़ा पाते हैं हम दीदा ओ दिल को ख़यानत से नहीं रख सकते बाज़ गरचे दस्त-ओ-पा को अक्सर बे-ख़ता पाते हैं हम दिल में दर्द-ए-इश्क़ ने मुद्दत से कर रक्खा है घर पर उसे आलूदा-ए-हिर्स-ओ-हवा पाते हैं हम हो के नादिम जुर्म से फिर जुर्म करते हैं वही जुर्म से गो आप को नादिम सदा पाते हैं हम हैं फ़िदा उन दोस्तों पर जिन में हो सिद्क़ ओ सफ़ा पर बहुत कम आप में सिद्क़ ओ सफ़ा पाते हैं हम गो किसी को आप से होने नहीं देते ख़फ़ा इक जहाँ से आप को लेकिन ख़फ़ा पाते हैं हम जानते अपने सिवा सब को हैं बे-मेहर ओ वफ़ा अपने में गर शम्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा पाते हैं हम बुख़्ल से मंसूब करते हैं ज़माने को सदा गर कभी तौफ़ीक़-ए-ईसार ओ अता पाते हैं हम हो अगर मक़्सद में नाकामी तो कर सकते हैं सब्र दर्द-ए-ख़ुद-कामी को लेकिन बे-दवा पाते हैं हम ठहरते जाते हैं जितने चश्म-ए-आलम में भले हाल नफ़्स-ए-दूँ का उतना ही बुरा पाते हैं हम जिस क़दर झुक झुक के मिलते हैं बुज़ुर्ग ओ ख़ुर्द से किब्र ओ नाज़ उतना ही अपने में सिवा पाते हैं हम गो भलाई कर के हम-जिंसों से ख़ुश होता है जी तह-नशीं उस में मगर दुर्द-ए-रिया पाते हैं हम है रिदा-ए-नेक-नामी दोश पर अपने मगर दाग़ रुस्वाई के कुछ ज़ेर-ए-रिदा पाते हैं हम राह के तालिब हैं पर बे-राह पड़ते हैं क़दम देखिए क्या ढूँढ़ते हैं और क्या पाते हैं हम नूर के हम ने गले देखे हैं ऐ 'हाली' मगर रंग कुछ तेरी अलापों में नया पाते हैं हम

Altaf Hussain Hali

0 likes

गो जवानी में थी कज-राई बहुत पर जवानी हम को याद आई बहुत ज़ेर-ए-बुर्क़ा तू ने क्या दिखला दिया जम्अ'' हैं हर सू तमाशाई बहुत हट पे इस की और पिस जाते हैं दिल रास है कुछ उस को ख़ुद-राई बहुत सर्व या गुल आँख में जचते नहीं दिल पे है नक़्श उस की रा'नाई बहुत चूर था ज़ख़्मों में और कहता था दिल राहत इस तकलीफ़ में पाई बहुत आ रही है चाह-ए-यूसुफ़ से सदा दोस्त याँ थोड़े हैं और भाई बहुत वस्ल के हो हो के सामाँ रह गए मेंह न बरसा और घटा छाई बहुत जाँ-निसारी पर वो बोल उट्ठे मिरी हैं फ़िदाई कम तमाशाई बहुत हम ने हर अदना को आला कर दिया ख़ाकसारी अपनी काम आई बहुत कर दिया चुप वाक़िआत-ए-दहर ने थी कभी हम में भी गोयाई बहुत घट गईं ख़ुद तल्ख़ियाँ अय्याम की या गई कुछ बढ़ शकेबाई बहुत हम न कहते थे कि 'हाली' चुप रहो रास्त-गोई में है रुस्वाई बहुत

Altaf Hussain Hali

0 likes

हक़ वफ़ा के जो हम जताने लगे आप कुछ कह के मुस्कुराने लगे था यहाँ दिल में तान-ए-वस्ल-ए-अदू उज़्र उन की ज़बाँ पे आने लगे हम को जीना पड़ेगा फ़ुर्क़त में वो अगर हिम्मत आज़माने लगे डर है मेरी ज़बाँ न खुल जाए अब वो बातें बहुत बनाने लगे जान बचती नज़र नहीं आती ग़ैर उल्फ़त बहुत जताने लगे तुम को करना पड़ेगा उज़्र-ए-जफ़ा हम अगर दर्द-ए-दिल सुनाने लगे सख़्त मुश्किल है शेवा-ए-तस्लीम हम भी आख़िर को जी चुराने लगे जी में है लूँ रज़ा-ए-पीर-ए-मुग़ाँ क़ाफ़िले फिर हरम को जाने लगे सिर्र-ए-बातिन को फ़ाश कर या रब अहल-ए-ज़ाहिर बहुत सताने लगे वक़्त-ए-रुख़्सत था सख़्त 'हाली' पर हम भी बैठे थे जब वो जाने लगे

Altaf Hussain Hali

0 likes

अब वो अगला सा इल्तिफ़ात नहीं जिस पे भूले थे हम वो बात नहीं मुझ को तुम से ए'तिमाद-ए-वफ़ा तुम को मुझ से पर इल्तिफ़ात नहीं रंज क्या क्या हैं एक जान के साथ ज़िंदगी मौत है हयात नहीं यूँँही गुज़रे तो सहल है लेकिन फ़ुर्सत-ए-ग़म को भी सबात नहीं कोई दिल-सोज़ हो तो कीजे बयाँ सरसरी दिल की वारदात नहीं ज़र्रा ज़र्रा है मज़हर-ए-ख़ुर्शीद जाग ऐ आँख दिन है रात नहीं क़ैस हो कोहकन हो या 'हाली' आशिक़ी कुछ किसी की ज़ात नहीं

Altaf Hussain Hali

0 likes

मैं तो मैं ग़ैर को मरने से अब इनकार नहीं इक क़यामत है तिरे हाथ में तलवार नहीं कुछ पता मंज़िल-ए-मक़्सूद का पाया हम ने जब ये जाना कि हमें ताक़त-ए-रफ़्तार नहीं चश्म-ए-बद-दूर बहुत फिरते हैं अग़्यार के साथ ग़ैरत-ए-इश्क़ से अब तक वो ख़बर-दार नहीं हो चुका नाज़ उठाने में है गो काम तमाम लिल्लाहिल-हम्द कि बाहम कोई तकरार नहीं मुद्दतों रश्क ने अग़्यार से मिलने न दिया दिल ने आख़िर ये दिया हुक्म कि कुछ आर नहीं अस्ल मक़्सूद का हर चीज़ में मिलता है पता वर्ना हम और किसी शय के तलबगार नहीं बात जो दिल में छुपाते नहीं बनती 'हाली' सख़्त मुश्किल है कि वो क़ाबिल-ए-इज़हार नहीं

Altaf Hussain Hali

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Altaf Hussain Hali.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Altaf Hussain Hali's ghazal.