बहारें लुटा दीं जवानी लुटा दी तुम्हारे लिए ज़िंदगानी लुटा दी सबा ने तो बरसाए गुल फ़स्ल-ए-गुल में घटा ने मय-ए-अरग़वानी लुटा दी अदाओं पे कर दी फ़िदा सारी हस्ती निगाहों पे दुनिया-ए-फ़ानी लुटा दी अजब दौलत-ए-हुस्न पाई थी दिल ने न मानी मिरी इक न मानी लुटा दी न खोना था ग़फ़लत में अहद-ए-जवानी अजब रात थी ये सुहानी लुटा दी न की हुस्न की क़द्र ऐ माह-ए-कामिल फ़क़त रात भर में जवानी लुटा दी हसीनों ने रंगीनी-ए-ख़्वाब-ए-शीरीं सुनी जब हमारी कहानी लुटा दी अजब हौसला हम ने ग़ुंचा का देखा तबस्सुम पे सारी जवानी लुटा दी 'जलील' आप की शा'इरी पर किसी ने निगाहों की जादू-बयानी लुटा दी
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ
Fahmi Badayuni
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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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अक्स है आईना-ए-दहर में सूरत मेरी कुछ हक़ीक़त नहीं इतनी है हक़ीक़त मेरी देखता मैं उसे क्यूँँकर कि नक़ाब उठते ही बन के दीवार खड़ी हो गई हैरत मेरी रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी आईने से उन्हें कुछ उन्स नहीं बात ये है चाहते हैं कोई देखा करे सूरत मेरी मैं ये समझूँ कोई माशूक़ मिरे हाथ आया मेरे क़ाबू में जो आ जाए तबीअ'त मेरी बू-ए-गेसू ने शगूफ़ा ये नया छोड़ा है निकहत-ए-गुल से उलझती है तबीअ'त मेरी उन से इज़हार-ए-मोहब्बत जो कोई करता है दूर से उस को दिखा देते हैं तुर्बत मेरी जाते जाते वो यही कर गए ताकीद 'जलील' दिल में रखिएगा हिफ़ाज़त से मोहब्बत मेरी
Jaleel Manikpuri
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न ख़ुशी अच्छी है ऐ दिल न मलाल अच्छा है यार जिस हाल में रक्खे वही हाल अच्छा है दिल-ए-बेताब को पहलू में मचलते क्या देर सुन ले इतना किसी काफ़िर का जमाल अच्छा है बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ अब के पूछा तो ये कह दूँगा कि हाल अच्छा है सोहबत आईने से बचपन में ख़ुदा ख़ैर करे वो अभी से कहीं समझें न जमाल अच्छा है मुश्तरी दिल का ये कह कह के बनाया उन को चीज़ अनोखी है नई जिंस है माल अच्छा है चश्म ओ दिल जिस के हों मुश्ताक़ वो सूरत अच्छी जिस की ता'रीफ़ हो घर घर वो जमाल अच्छा है यार तक रोज़ पहुँचती है बुराई मेरी रश्क होता है कि मुझ से मिरा हाल अच्छा है अपनी आँखें नज़र आती हैं जो अच्छी उन को जानते हैं मिरे बीमार का हाल अच्छा है बातों बातों में लगा लाए हसीनों को 'जलील' तुम को भी सेहर-बयानी में कमाल अच्छा है
Jaleel Manikpuri
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