ghazalKuch Alfaaz

न ख़ुशी अच्छी है ऐ दिल न मलाल अच्छा है यार जिस हाल में रक्खे वही हाल अच्छा है दिल-ए-बेताब को पहलू में मचलते क्या देर सुन ले इतना किसी काफ़िर का जमाल अच्छा है बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ अब के पूछा तो ये कह दूँगा कि हाल अच्छा है सोहबत आईने से बचपन में ख़ुदा ख़ैर करे वो अभी से कहीं समझें न जमाल अच्छा है मुश्तरी दिल का ये कह कह के बनाया उन को चीज़ अनोखी है नई जिंस है माल अच्छा है चश्म ओ दिल जिस के हों मुश्ताक़ वो सूरत अच्छी जिस की ता'रीफ़ हो घर घर वो जमाल अच्छा है यार तक रोज़ पहुँचती है बुराई मेरी रश्क होता है कि मुझ से मिरा हाल अच्छा है अपनी आँखें नज़र आती हैं जो अच्छी उन को जानते हैं मिरे बीमार का हाल अच्छा है बातों बातों में लगा लाए हसीनों को 'जलील' तुम को भी सेहर-बयानी में कमाल अच्छा है

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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बहारें लुटा दीं जवानी लुटा दी तुम्हारे लिए ज़िंदगानी लुटा दी सबा ने तो बरसाए गुल फ़स्ल-ए-गुल में घटा ने मय-ए-अरग़वानी लुटा दी अदाओं पे कर दी फ़िदा सारी हस्ती निगाहों पे दुनिया-ए-फ़ानी लुटा दी अजब दौलत-ए-हुस्न पाई थी दिल ने न मानी मिरी इक न मानी लुटा दी न खोना था ग़फ़लत में अहद-ए-जवानी अजब रात थी ये सुहानी लुटा दी न की हुस्न की क़द्र ऐ माह-ए-कामिल फ़क़त रात भर में जवानी लुटा दी हसीनों ने रंगीनी-ए-ख़्वाब-ए-शीरीं सुनी जब हमारी कहानी लुटा दी अजब हौसला हम ने ग़ुंचा का देखा तबस्सुम पे सारी जवानी लुटा दी 'जलील' आप की शा'इरी पर किसी ने निगाहों की जादू-बयानी लुटा दी

Jaleel Manikpuri

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अक्स है आईना-ए-दहर में सूरत मेरी कुछ हक़ीक़त नहीं इतनी है हक़ीक़त मेरी देखता मैं उसे क्यूँँकर कि नक़ाब उठते ही बन के दीवार खड़ी हो गई हैरत मेरी रोज़ वो ख़्वाब में आते हैं गले मिलने को मैं जो सोता हूँ तो जाग उठती है क़िस्मत मेरी सच है एहसान का भी बोझ बहुत होता है चार फूलों से दबी जाती है तुर्बत मेरी आईने से उन्हें कुछ उन्स नहीं बात ये है चाहते हैं कोई देखा करे सूरत मेरी मैं ये समझूँ कोई माशूक़ मिरे हाथ आया मेरे क़ाबू में जो आ जाए तबीअ'त मेरी बू-ए-गेसू ने शगूफ़ा ये नया छोड़ा है निकहत-ए-गुल से उलझती है तबीअ'त मेरी उन से इज़हार-ए-मोहब्बत जो कोई करता है दूर से उस को दिखा देते हैं तुर्बत मेरी जाते जाते वो यही कर गए ताकीद 'जलील' दिल में रखिएगा हिफ़ाज़त से मोहब्बत मेरी

Jaleel Manikpuri

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