ghazalKuch Alfaaz

बहुत रहा है कभी लुत्फ़-ए-यार हम पर भी गुज़र चुकी है ये फ़स्ल-ए-बहार हम पर भी उरूस-ए-दहर को आया था प्यार हम पर भी ये बेसवा थी किसी शब निसार हम पर भी बिठा चुका है ज़माना हमें भी मसनद पर हुआ किए हैं जवाहिर निसार हम पर भी अदू को भी जो बनाया है तुम ने महरम-ए-राज़ तो फ़ख़्र क्या जो हुआ ए'तिबार हम पर भी ख़ता किसी की हो लेकिन खुली जो उन की ज़बाँ तो हो ही जाते हैं दो एक वार हम पर भी हम ऐसे रिंद मगर ये ज़माना है वो ग़ज़ब कि डाल ही दिया दुनिया का बार हम पर भी हमें भी आतिश-ए-उल्फ़त जला चुकी 'अकबर' हराम हो गई दोज़ख़ की नार हम पर भी

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कभी मिलेंगे तो ये कर्ज़ भी उतारेंगे तुम्हारे चेहरे को पहरों तलक निहारेंगे ये क्या सितम कि खिलाड़ी बदल दिया उस ने हम इस उमीद पे बैठे थे हम ही हारेंगे हमारे बा'द तेरे इश्क़ में नए लड़के बदन तो चू मेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे

Vikram Gaur Vairagi

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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मुझ को दरवाज़े पर ही रोक लिया जाता है मेरे आने से भला आप का क्या जाता है तुम अगर जाने लगे हो तो पलट कर मत देखो मौत लिखकर तो क़लम तोड़ दिया जाता है तुझ को बतलाता मगर शर्म बहुत आती है तेरी तस्वीर से जो काम लिया जाता है

Tehzeeb Hafi

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ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे मुँह से जो नहीं निकली है अब हाँ न करेंगे क्यूँँ ज़ुल्फ़ का बोसा मुझे लेने नहीं देते कहते हैं कि वल्लाह परेशाँ न करेंगे है ज़ेहन में इक बात तुम्हारे मुतअल्लिक़ ख़ल्वत में जो पूछोगे तो पिन्हाँ न करेंगे वाइज़ तो बनाते हैं मुसलमान को काफ़िर अफ़्सोस ये काफ़िर को मुसलमाँ न करेंगे क्यूँँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे दीवाना न समझे हमें वो समझे शराबी अब चाक कभी जेब ओ गरेबाँ न करेंगे वो जानते हैं ग़ैर मिरे घर में है मेहमाँ आएँगे तो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे

Akbar Allahabadi

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हंगामा है क्या बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है वाँ दिल में कि सद में दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्में हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है

Akbar Allahabadi

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हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शैख़ जी को फ़रबही मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन जोश-ए-दिल काफ़ी है 'अकबर' तान उड़ाने के लिए

Akbar Allahabadi

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तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है बला के पेच में आया हुआ है न क्यूँँकर बू-ए-ख़ूँ ना में से आए उसी जल्लाद का लिक्खा हुआ है चले दुनिया से जिस की याद में हम ग़ज़ब है वो हमें भूला हुआ है कहूँ क्या हाल अगली इशरतों का वो था इक ख़्वाब जो भूला हुआ है जफ़ा हो या वफ़ा हम सब में ख़ुश हैं करें क्या अब तो दिल अटका हुआ है हुई है इश्क़ ही से हुस्न की क़द्र हमीं से आप का शोहरा हुआ है बुतों पर रहती है माइल हमेशा तबीअत को ख़ुदाया क्या हुआ है परेशाँ रहते हो दिन रात 'अकबर' ये किस की ज़ुल्फ़ का सौदा हुआ है

Akbar Allahabadi

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अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए अख़बार में तो नाम मिरा छाप दीजिए देखो जिसे वो पाइनियर ऑफ़िस में है डटा बहर-ए-ख़ुदा मुझे भी कहीं छाप दीजिए चश्म-ए-जहाँ से हालत-ए-असली छुपी नहीं अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए दावा बहुत बड़ा है रियाज़ी में आप को तूल-ए-शब-ए-फ़िराक़ को तो नाप दीजिए सुनते नहीं हैं शैख़ नई रौशनी की बात इंजन की उन के कान में अब भाप दीजिए इस बुत के दर पे ग़ैर से 'अकबर' ने कह दिया ज़र ही मैं देने लाया हूँ जान आप दीजिए

Akbar Allahabadi

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