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baja ki aankh men nindon ke silsile bhi nahin shikast-e-khvab ke ab mujh men hausle bhi nahin nahin nahin ye khabar dushmanon ne di hogi vo aae aa ke chale bhi gae mile bhi nahin ye kaun log andheron ki baat karte hain abhi to chand tiri yaad ke dhale bhi nahin abhi se mere rafugar ke haath thakne lage abhi to chaak mire zakhm ke sile bhi nahin khafa agarche hamesha hue magar ab ke vo barhami hai ki ham se unhen gile bhi nahin baja ki aankh mein nindon ke silsile bhi nahin shikast-e-khwab ke ab mujh mein hausle bhi nahin nahin nahin ye khabar dushmanon ne di hogi wo aae aa ke chale bhi gae mile bhi nahin ye kaun log andheron ki baat karte hain abhi to chand teri yaad ke dhale bhi nahin abhi se mere rafugar ke hath thakne lage abhi to chaak mere zakhm ke sile bhi nahin khafa agarche hamesha hue magar ab ke wo barhami hai ki hum se unhen gile bhi nahin

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा

Fahmi Badayuni

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से ज़मीं की ख़ैर माँगे आसमाँ से अगर चाहें तो वो दीवार कर दें हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से सितारा ही नहीं जब साथ देता तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से किसी ने बात की थी हँस के शायद ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से जो सब्ज़ा देख कर ख़े में लगाएँ उन्हें तकलीफ़ क्यूँँ पहुँचे ख़िज़ाँ से जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से

Parveen Shakir

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अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ इक ज़रा शे'र कहूँ और मैं क्या क्या देखूँ नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ काश संदल से मिरी माँग उजाले आ कर इतने ग़ैरों में वही हाथ जो अपना देखूँ तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात जाने क्यूँँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँँ हर बात सुनूँ एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ

Parveen Shakir

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दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है तिरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है तिरे बदलने के बा-वस्फ़ तुझ को चाहा है ये ए'तिराफ़ भी शामिल मिरे गुनाह में है अज़ाब देगा तो फिर मुझ को ख़्वाब भी देगा मैं मुतमइन हूँ मिरा दिल तिरी पनाह में है बिखर चुका है मगर मुस्कुरा के मिलता है वो रख रखाव अभी मेरे कज-कुलाह में है जिसे बहार के मेहमान ख़ाली छोड़ गए वो इक मकान अभी तक मकीं की चाह में है यही वो दिन थे जब इक दूसरे को पाया था हमारी साल-गिरह ठीक अब के माह में है मैं बच भी जाऊँ तो तन्हाई मार डालेगी मिरे क़बीले का हर फ़र्द क़त्ल-गाह में है

Parveen Shakir

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अश्क आँख में फिर अटक रहा है कंकर सा कोई खटक रहा है मैं उस के ख़याल से गुरेज़ाँ वो मेरी सदा झटक रहा है तहरीर उसी की है मगर दिल ख़त पढ़ते हुए अटक रहा है हैं फ़ोन पे किस के साथ बातें और ज़ेहन कहाँ भटक रहा है सदियों से सफ़र में है समुंदर साहिल पे थकन टपक रहा है इक चाँद सलीब-ए-शाख़-ए-गुल पर बाली की तरह लटक रहा है

Parveen Shakir

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अब इतनी सादगी लाएँ कहाँ से ज़मीं की ख़ैर माँगे आसमाँ से अगर चाहें तो वो दीवार कर दें हमें अब कुछ नहीं कहना ज़बाँ से सितारा ही नहीं जब साथ देता तो कश्ती काम ले क्या बादबाँ से भटकने से मिले फ़ुर्सत तो पूछें पता मंज़िल का मीर-ए-कारवाँ से तवज्जोह बर्क़ की हासिल रही है सो है आज़ाद फ़िक्र-ए-आशियाँ से हवा को राज़-दाँ हम ने बनाया और अब नाराज़ ख़ुशबू के बयाँ से ज़रूरी हो गई है दिल की ज़ीनत मकीं पहचाने जाते हैं मकाँ से फ़ना-फ़िल-इश्क़ होना चाहते थे मगर फ़ुर्सत न थी कार-ए-जहाँ से वगर्ना फ़स्ल-ए-गुल की क़द्र क्या थी बड़ी हिकमत है वाबस्ता ख़िज़ाँ से किसी ने बात की थी हँस के शायद ज़माने भर से हैं हम ख़ुद गुमाँ से मैं इक इक तीर पे ख़ुद ढाल बनती अगर होता वो दुश्मन की कमाँ से जो सब्ज़ा देख कर ख़े में लगाएँ उन्हें तकलीफ़ क्यूँँ पहुँचे ख़िज़ाँ से जो अपने पेड़ जलते छोड़ जाएँ उन्हें क्या हक़ कि रूठें बाग़बाँ से

Parveen Shakir

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